धनौड़ा गांव में तेजपात के पत्ते बोरे में भरते पूर्वसैनिक केशव दत्त
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धनौड़ा गांव के केशव दत्त मखौलिया ने सेना से रिटायर होने के बाद कोई दूसरा रोजगार ढूंढने के बजाए तेजपात उगाने की ठानी थी। सिर्फ छह साल की मेहनत में ही वह उत्तराखंड के अग्रणी तेजपात उत्पादक काश्तकार बन गए हैं। वर्ष 2010 में सेना से रिटायर होने के बाद केशव दत्त को कुछ नया काम शुरू करने की छटपटाहट थी। उन्होंने अपनी खाली पड़ी जमीन पर तेजपात के पौधे उगाने का मन बनाया। वर्ष 2011 में जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान के मास्टर ट्रेनर नारायण दत्त जोशी ने उनको तेजपात के 25 पौधे उपलब्ध कराए। गांव की मिट्टी और जलवायु में यह पौधे तेजी से पनप गए। इनमें पत्तियां भी काफी मात्रा में आ गई।
केशव दत्त ने इस परिणाम से उत्साहित होकर ज्यादा संख्या में पौधों का रोपण किया। इस बार उन्होंने 60 किलोग्राम सूखा तेजपात पैदा किया और इसे बाजार में 50 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेच भी दिया। वह कहते हैं कि तेजपात की मांग बहुत अधिक है। इसे बाजार में बेचने में कोई दिक्कत नहीं आती। तेजपात का उपयोग बेहतरीन मसालों के रूप में होता है। कई व्यंजनों में इसे स्वाद बढ़ाने के लिए मिलाया जाता है। केशव दत्त ने कहा कि पहाड़ के नौजवान यदि अपने गांव की खाली पड़ी जमीन पर सब्जी, मसाले, फल पैदा करें तो उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आ सकता है और छोटी नौकरी के लिए पलायन नहीं करना पड़ेगा।
जड़ी-बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिक डा. बीपी भट्ट ने बताया कि उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में तेजपात का उत्पादन आसानी से कम मेहनत में हो सकता है। तेजपात के कृषिकरण और मार्केटिंग के लिए समिति का गठन भी किया गया है। उन्होंने बताया कि तेजपात शुगर की बीमारी में बेहद उपयोगी है। संस्थान के निदेशक डा. जेसी कैम ने बताया कि तेजपात का उत्पादन बढ़ाने और किसानों को प्रेरित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।