बस्तड़ी के लोग अपनी आने वाली पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी को रहने के लिए घर दिलाने की चिंता में हैं। अब ज्यादा समय तक रिश्तेदारों के यहां रह पाना संभव नहीं है। टेंट में भी अधिक समय बिता पाने की स्थिति में लोग नहीं हैं। लिहाजा, बस्तड़ी के लोगों ने बैठक कर सरकार और प्रशासन से मांग की कि सिंघाली के पास उनकी कुछ नाप जमीन है और उसी से लगी वन पंचायत की जमीन भी है। इसी जमीन पर प्रभावितों के लिए टिनशेड और हट्स का निर्माण किया जाए। ताकि लोग धीरे-धीरे उसी स्थान पर पक्के मकानों का निर्माण कर सकें।
बस्तड़ी के लोगों ने शनिवार को राहत कैंप के पास ही बैठक की। कहा गया कि सरकार किराए के मकान ढूंढने की बात कर रही है, लेकिन सिंघाली कस्बे में कोई भी मकान खाली नहीं है। राहत कैंप और टेंट में ज्यादा समय रह पाना संभव नहीं है। ऐसे में हर पीड़ित के लिए एक-एक टिनशेड या हट का निर्माण किया जाना जरूरी है। फिलहाल लोगों ने 21 टिनशेड की मांग की है।
बारिश का सीजन पूरा होने तक लोग इन टिनशेड में रहेंगे और उसके बाद अपने लिए पक्का मकान बनाने का काम करेंगे। गांव के शंकर भट्ट और गोविंद भट्ट ने कहा कि अब जीवित बचे लोगों को अपनी स्थायी व्यवस्था करनी पड़ेगी। कोई भी व्यक्ति अब न तो गांव में जाना चाहता है और न वहां पर रहने लायक स्थिति रह गई है। लोगों की मांग है कि सबसे पहले जानवरों को रखने के लिए अस्थायी शेड का निर्माण किया जाए।
जानवरों को बेचने लगे लोग
बस्तड़ी के लोगों के सामने खुद के सिर छुपाने की समस्या आ रही है। जानवरों को पाल पाना संभव नहीं हो पा रहा है। जानवरों के लिए चारा, घास की व्यवस्था भी नहीं हो पा रही है। लोग अब जानवरों को औने-पौने दामों में बेचने लगे हैं। आपदा ने लोगों के आर्थिक ढांचे को कमजोर कर रख दिया है, जिन जानवरों के सहारे लोग आजीविका चलाते थे अब उनके लिए ही आश्रय की समस्या पैदा हो गई है।