दिवाली पर बस्तड़ी में इस तरह मायूस हैं आपदा पीड़ित
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आपदा प्रभावित बस्तड़ी में धनतेरस की रात मायूसी थी। पिछले साल तक दिवाली के मौके पर अन्य शहरों में नौकरी करने वाले लोग जरूर गांव आते थे, लेकिन इस बार कोई भी गांव नहीं आया। इसकी मुख्य वजह यही है कि अब गांव में कोई नहीं रहता। अधिकांश मकान या तो पूरी तरह टूट गए हैं या फिर वह इतने क्षतिग्रस्त हैं कि उनमें रहने लायक स्थिति नहीं है। सभी परिवार या तो राहत कैंपों में हैं या फिर किराए के मकानों में रह रहे हैं। मूल गांव में अब कोई नहीं रहता।
बस्तड़ी निवासी दुकानदार शंकर दत्त भट्ट ने बताया कि गांव के किसी भी व्यक्ति ने धनतेरस पर खरीदारी नहीं की। खरीदारी करने के बाद सामान कहां रखा जाए यह बड़ा संकट है। उन्होंने कहा कि आपदा ने न केवल लोगों की जिंदगी को लील लिया, वरन सांस्कृतिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया है। हर परिवार ने कोई न कोई सदस्य जरूर खोया है। वैसे भी पहाड़ पर एक परंपरा है कि यदि किसी परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है तो उस परिवार के लोग सालभर कोई त्यौहार नहीं मनाते। बस्तड़ी के लोगों ने तो एक साथ 21 लोगों को खोया है।
शंकर भट्ट बताते हैं कि सरकार और प्रशासन ने उनको ज्यादा दुविधा में डाल दिया था। गांव को भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील और मकानों को रहने के लिए खतरनाक घोषित तो कर दिया, लेकिन नए मकान नहीं बनाए। पूरा गांव एक जुलाई को खाली हो गया था। जानवर, कपड़े, बिस्तर एवं बचाखुचा सामान लेकर लोग सिंघाली कस्बे में आ गए। तब से किसी ने भी गांव जाने की जरूरत नहीं समझी।
आज सिर्फ एक दीया जलेगा
बस्तड़ी का हर परिवार अपने किराए के मकान में दिवाली की रात सिर्फ एक एक दीया जलाएंगे। आतिशबाजी का कोई भी सामान किसी बच्चे ने नहीं खरीदा है। बस्तड़ी निवासी शंकर दत्त भट्ट बताते हैं कि दिवाली की रात जलने वाला दीया मृतकों की आत्मा की शांति के लिए होगा। उन्होंने कहा कि किसी भी गांव पर अब ऐसी विपदा न आए।