चंपावत। कृषि विज्ञान केंद्र लोहाघाट पिथौरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाले उत्पादों की चंपावत में खेती करने का काम करेगा। वर्तमान में दारमा वैली में चल रहे प्रोजेक्ट के तहत केंद्र ने प्रायोगिक तौर पर लोहाघाट केविके में काम करना शुरू कर दिया है।
कृषि विज्ञान केंद्र परियोजना के तहत दारमा वैली के गांवों में होने वाले उत्पादों को चंपावत में उत्पादित करने का काम किया जाएगा। पिथौरागढ़ जिले की दारमा वैली के दर, नागलिंग, बालिंग, दुग्तू, दांतू और तिदांग गांव में काश्तकार काली राजमा, फाफर, हल्दी आदि का उत्पादन करते हैं। खास बात है कि यहां होने वाले सभी उत्पाद पूरी तरह जैविक और पोषण से भरे होते हैं। उन्होंने बताया कि चंपावत में भी वहां के उत्पादों का उत्पादन किया जाएगा। काली राजमा आदि उत्पादों की खेती विविध कृषि के रूप में करने के लिए काश्तकारों को प्रेरित किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में काली राजमा, कलौज, समयो, बीन, जंबू आदि को प्रायोगिक तौर पर पॉलीहाउस में लगाया गया है। सफलता मिलने के बाद वृहद स्तर पर जिले में इसकी खेती के लिए किसानों को प्रेरित किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा और केविके मिलकर संचालित कर रहे हैं। तीन साल के प्रोजेक्ट में डॉ. शैलजा पुनेठा और डॉ. दीपाली तिवारी काम कर रही हैं। संवाद
हर प्रकार से जांची जाएगी गुणवत्ता
केविके में विशेषज्ञों ने धारचूला से लाए उत्पादों को पाॅलीहाउस के साथ ही खुले में लगाया है। तैयार होने के बाद इन उत्पादों के अंतर को देखा जाएगा। दारमा में मिलने वाले उत्पादों और यहां पॉलीहाउस तथा खुले में लगाए गए उत्पादों में क्या अंतर है, इसकी जांच की जाएगी। उसके स्वाद, पोषण आदि का अध्ययन किया जाएगा। सकारात्मक परिणाम आने पर स्थानीय किसानों को इसके उत्पादन के लिए प्रेरित किया जाएगा। - डॉ. दीपाली तिवारी, प्रभारी, केविके, चंपावत