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बस्तड़ी के आपदा पीड़ित होली नहीं मनाएंगे

Tue, 07 Mar 2017 09:57 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, डीडीहाट
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अब नए स्थान पर मकान बनाने में लगे बस्तड़ी के आपदा प्रभावित - फोटो : अमर उजाला
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बस्तड़ी के आपदा पीड़ित इस बार होली नहीं मनाएंगे। बस्तड़ी के धनलेख लोक देवता मंदिर में इस बार-हों तो सूरत लगी दर्शन की, दर्शन दे भगवान, धनतेरो, या फिर हरियो पीपल द्वारे सोहे, वट सोहे पिछवाड़ धनतेरो, तीनों लोक से मथुरा न्यारी जहां जनम कृष्ण लियो जैसे होली गीत भी सुनाई नहीं देंगे।
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30 जून की रात आपदा के कारण तबाह हुए बस्तड़ी गांव के लोग अब होली नहीं मनाएंगे। इससे पहले लोगों ने आठूं और दिवाली भी आपदा के दुख में नहीं मनाई थी। बस्तड़ी गांव में 1987 से पहले होली खूब मनाई जाती थी। लोग पांच दिनों तक घर-घर जाकर होली गाते थे। खूब नाच-गाना होता था। घरों में भोजन की व्यवस्था होती थी, लेकिन 1987 में यह परंपरा बंद कर दी गई, लेकिन 1997 में एक बार फिर से गांव के संस्कृति प्रेमियों, नौजवानों, महिलाओं ने होली को मनाने का फैसला लिया। पिछले साल तक गांव के लोग लोक देवता धनलेख के मंदिर में एकत्र होते थे और लगातार तीन दिनों तक देवी-देवताओं की स्तुति वाली होली के साथ-साथ होली के अन्य मस्ती भरे गीत गाते। गांव के नौजवान होली पर जरूर घर आते थे। ढोलक और मजीरे की ताल पर लोग खूब नाचते थे।

30 जून की आपदा ने पूरे बस्तड़ी गांव को तो तबाह कर दिया। साथ में 21 लोगों की जान चली गई। इनमें आठ युवा भी शामिल थे। आपदा ने हर घर को किसी न किसी तरह कष्ट दिया। यदि किसी परिवार में सौभाग्य से किसी की जान नहीं गई तो उस परिवार की सारी संपत्ति आपदा से तबाह हो गई। बस्तड़ी गांव का अस्तित्व समाप्त हो गया। पूरा गांव बस्तड़ी से शिफ्ट होकर सिंघाली में आ गया। कुछ परिवार सरकारी मदद से इसी स्थान पर नए मकानों का निर्माण कर रहे हैं। इस बीच गांव में न तो होली की कोई तैयारी है और न लोगों में इसे लेकर किसी प्रकार की उत्सुकता ही देखने को मिल रही है।
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गांव के संस्कृति प्रेमी शंकर दत्त भट्ट ने कहा कि अब होली की परंपरा को एक बार फिर से विराम दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि होली रंगों, मौजमस्ती का पर्व है। जिस गांव का सबकुछ छिन गया हो वहां पर मौजमस्ती कैसे संभव होगी। इस समय तो लोगों को अपना सिर छुपाने का इंतजाम करने की चिंता है। वह कहते हैं कि वैसे भी यदि किसी वर्ष किसी परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है तो पूरे वर्ष के पर्व को वर्जित किया जाता है। यहां तो पूरा गांव ही मौत के मुहाने से बाहर निकला है। 
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