पिथौरागढ़। नाकामी भी सफलता की सीढ़ी होती है, बशर्ते असफलता से सीख ले आगे बढ़ा जाए। इस बात को साकार किया है दुर्गम क्षेत्र बांसबगड़ के होशियार सिंह बिष्ट ने। कभी चतुर्थ श्रेणी की परीक्षा देकर भी उस नौकरी को नहीं पाने वाला ग्रामीण पृष्ठभूमि का यह नौजवान सात महीनों में चार परीक्षाओं में कामयाबी का झंडा गाड़ चुका है। जबकि इससे पूर्व वे तीन दर्जन से अधिक परीक्षाओं में असफलता के कड़ुवे घूंट भी पी चुके थे। अब वह नौजवानों की प्रेरणा बन चुके हैं।
पिता शिवसिंह बिष्ट वर्षों पूर्व फौज से रिटायर हो चुके थे। परिवार की खराब हालत के चलते कुछ वक्त पूर्व तक किसी भी नौकरी को करने की इच्छा रखने वाले होशियार के पास आज अवसरों की भरमार है। एमएससी (गणित) में प्रथम श्रेणी पास होने के अलावा होशियार इतिहास विषय से एमए और बीएड भी हैं। उन्होंने 2006 से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। तीन दर्जन से अधिक परीक्षाओं में सम्मिलित हो चुके होशियार कई बार इंटरव्यू तक तो पहुंचे लेकिन मंजिल हासिल नहीं कर सके।
लगातार नाकामियों के बाद भी उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और अब नतीजा सामने है। होशियार बिष्ट इस वर्ष उत्तराखंड प्राविधिक परिषद रुड़की द्वारा आयोजित समूह ग की ग्रुप-1 के तहत सहायक सांख्यिकी अधिकारी, ग्राम्य विकास अधिकारी, जिला सहकारी बैंक द्वारा आयोजित कनिष्ठ शाखा प्रबंधक और कार्यालय सहायक की परीक्षा में सफल हो चुके हैं। वह इस साल राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित अवर अधीनस्थ परीक्षा 2010 की मुख्य परीक्षा भी दे चुके हैं। जिसका परिणाम आना बाकी है। साथ ही प्रवर अधीनस्थ सम्मिलित परीक्षा (पीसीएस) की मुख्य परीक्षा के लिए भी क्वालीफाई किया है।
अब कामयाबी के रथ पर सवार होशियार कभी बेरोजगारी से इस कदर परेशान थे कि उन्होंने शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी पद के लिए भी आवेदन किया। लेकिन परीक्षा प्रक्रिया में हुए विवाद के चलते यह नौकरी भी वह नहीं पा सके। होशियार कहते हैं कि हार न मानने की जिद से वह सफलता का स्वाद चख सके। अलबत्ता अब भी शिक्षक बनना उनका सपना है। वह अपनी सफलताओं का श्रेय अपने माता-पिता और मित्रों को देते हैं।