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कूड़ा निस्तारण का जरिया बनी रामगंगा

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थल (पिथौरागढ़)। थल के पास बहने वाली रामगंगा कूड़ा निस्तारण का जरिया बन गई है। इस नदी में कभी स्पर्श गंगा या गंगा बचाओ अभियान तो नहीं चला, लेकिन पूरे कस्बे और गांवों का कूड़ा इसी नदी पर लगातार डाला जा रहा है।
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नामिक ग्लेशियर से निकलने वाली रामगंगा का पानी तेजम तक एकदम साफ रहता है। जैसे ही नदी आबादी के किनारे से निकलती है, उसमें जगह-जगह कूड़ा, गंदगी डालने का क्रम शुरू हो जाता है। थल पहुंचते ही रामगंगा पूरी तरह प्रदूषण की चपेट में आ जाती है। खास बात यह है कि थल की रामगंगा में मकर संक्रांति, शिवरात्रि और बैशाखी के दिन सैकड़ों लोग स्नान के लिए पहुंचते हैं, लेकिन रामगंगा की गंदगी को देख लोग उसमें स्नान करने से कतराते हैं।

लोगों का कहना है कि प्रशासन के स्तर से रामगंगा घाट की कभी सफाई नहीं की गई और लोगों को अब तक इस बात के लिए जागरूक नहीं किया गया है कि नदी में गंदगी न डालें। थल बाजार में लोगों का जहां मन हुआ वहीं पर नदी में कूड़ा फेंक देते हैं। थल में करीब दो किलोमीटर के दायरे में रामगंगा सबसे ज्यादा गंदी है। व्यापारियों की ओर से कभी-कभार सफाई का अभियान तो चलाया जाता है, लेकिन व्यापार संघ के पास संसाधनों की भारी कमी है।
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तहसील प्रशासन के पास ऐसा कोई मद नहीं है, जिससे नदी की गंदगी को साफ किया जा सके। तहसीलदार रघुवीर सिंह का कहना है कि नदी के इतने लंबे घाट की सफाई के लिए काफी संसाधनों की जरूरत होगी।

लोगों को कानून का भय दिखाना जरूरी
स्थानीय निवासी गिरधर कुमार का कहना है कि अन्य स्थानों पर तो प्रशासन गंदगी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करता है, लेकिन थल में कार्रवाई तो दूर लोगों को समझाने तक के लिए कोई नहीं आता। यदि लोगों को एक बार कार्रवाई का भय दिखाया जाता तो शायद ऐसी हरकतों में रोक लग जाती। उन्होंने कहा कि जनता खुद तो जागरूक नहीं है। उसको कानून का भय दिखाकर ही रोकथाम हो सकती है।

क्या ऐसा होता है स्वच्छ भारत अभियान
थल निवासी कल्याण सिंह खड़ायत का कहना है कि पूरे देश में स्वच्छ भारत अभियान का हल्ला हो रहा है, लेकिन यहां तो नदी को ही गंदा किया जा रहा है। सरकार दावा करती है कि जिला खुले में शौच की प्रथा से मुक्त हो गया है, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी कई लोग नदी के किनारे खुले में शौच करते हैं। यदि खुले शब्दों में कहा जाए तो कम से कम थल में स्वच्छ भारत अभियान का कोई असर नहीं है।
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