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गैरसैंण को लेकर फिर आंदोलन के पक्ष में लोग

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पिथौरागढ़। राज्य आंदोलन से लेकर स्थापना तक पहाड़ का जनमानस गैरसैंण राजधानी को लेकर आंदोलन रहा है। राज्य स्थापना से लेकर अब तक कई बार गैरसैंण को लेकर आवाज उठती रही है। उत्तराखंड क्रांति दल के इतर भी विभिन्न सामाजिक संगठन समय-समय पर गैरसैंण के पक्ष में आवाज बुलंद करते आए हैं। अब गैरसैंण में प्रस्तावित सत्र और आंदोलन की आहट मिलने के बाद जनभावनाओं का ज्वार उठने लगा है। लोग फिर से गैरसैंण को लेकर मुखर हो रहे हैं। इसके लिए जरुरत पड़ने पर उन्हें फिर एक आंदोलन से कतई परहेज नहीं है।
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फैसला न हुआ तो फिर सड़क पर होगी जनता
राज्य गठन के 17 सालों से जनता गैरसैंण को राजधानी बनते देखना चाहती है। लेकिन सरकारें इस मामले को लटकाए रखना चाहती हैं। अब वक्त आ गया है कि सरकार जनभावनाओं के अनुरूप राजधानी पर स्पष्ट फैसला ले। ऐसा न होने पर जनता एक बार फिर राज्य आंदोलन की तरह की राजधानी को लेकर सड़कों पर नजर आएगी।
मोहन चंद्र भट्ट, पूर्व अध्यक्ष जिला बार संघ

लखनऊ और देहरादून में नहीं रह गया फर्क
अस्थाई राजधानी में बैठकर नेता और नौकरशाही चकाचौंध वाली संस्कृति में डूबी है। ऐसे में लखनऊ और देहरादून में कोई फर्क नहीं रह गया है। पहाड़ के मुद्दे और नीतियां आज भी गौण हैं। आज भी गैरसैंण में पहाड़ी राज्य की आत्मा बसती है। गैरसैंण राजधानी को लेकर व्यापक आंदोलन की जरुरत महसूस की जा रही है।
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गोविंद कफलिया, राज्य आंदोलनकारी

पहाड़ी राजधानी के लिए फिर आंदोलन की जरुरत
उत्तराखंड पहाड़ी राज्य है। इसकी राजधानी भी पहाड़ी क्षेत्र में होनी चाहिए। राजधानी पहाड़ में होने से ही राज्य की अवधारणा साकार हो सकती है। तभी पलायन, शिक्षा, चिकित्सा जैसी बड़ी समस्याओं का हल निकलेगा। गैरसैंण को लेकर फिर से आंदोलन की जरुरत महसूस की जा रही है। इसके लिए समाज के हर वर्ग से जुड़े लोग तैयार हैं।
कृष्णा कापड़ी, सामाजिक कार्यकर्ता

शहरों की चकाचौंध के बीच खोया उत्तराखंड
राज्य गठन के साथ ही जन भावनाओं के अनुरूप गैरसैंण को राजधानी बना देना चाहिए था। लेकिन सरकार आज तक इस मुद्दे को टालती आई है। नतीजन शहरों की चकाचौंध के बीच असल उत्तराखंड कहीं खो गया है। राज्य की स्थापना से जुड़े मुद्दे आज भी बरकरार हैं। राज्यवास ियों को फिर से आंदोलन चलाने से कोई गुरेज नहीं होगा।
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राजेंद्र सिंह बोरा, सामाजिक कार्यकर्ता
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