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प्रकृति मेहरबान पर सरकारों ने नहीं दिया ध्यान

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पिथौरागढ़। नामिक और हीरामणि ग्लेशियर की तलहटी पर बसे नामिक गांव को प्रकृति ने तो बहुत कुछ दिया, लेकिन कोई भी सरकार अब तक इस सुंदर गांव पर मेहरबान नहीं हुई है। यहां आज भी मुख्य सड़क तक आने के लिए लोगों को 27 किमी का पैदल सफर करना पड़ता है। इसके अलावा संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा की व्यवस्था भी कोई ठीक नहीं है। नामिक चीन सीमा से लगा पिथौरागढ़ जिले का अंतिम गांव है।
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नामिक के लोगों का न तीज त्योहार का तरीका बदला, न रहन सहन, न खानपान का तरीका। नामिक के लोग अपनी संस्कृति और परंपरा को भी सहेजे हुए हैं। कोई बात टीस देने वाली है तो वह यह है कि देश की आजादी के 70 साल बीतने के बाद भी नामिक गांव की समस्याओं में किसी तरह का बदलाव नहीं आया। यहां के लोगों को मुख्य सड़क तक आने के लिए अब भी 27 किमी का सफर पैदल तय करना पड़ता है।

लंबी जद्दोजहद के बाद वर्ष 2015 में 718 आबादी वाले नामिक के लिए नाचनी के नजदीक होकरा से 17 किमी लंबी सड़क मंजूर की गई। बागेश्वर जिले के गोगिना से भी नामिक के लिए आठ किमी लंबी सड़क मंजूर हुई, लेकिन दोनों सड़कों का काम वन भूमि निस्तारण न होने के कारण लटक गया। नामिक में संचार सुविधा भी नहीं है। ग्राम प्रधान के घर पर सेटेलाइट फोन लगा है, वह काम नहीं करता।
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वर्ष 2013 में नामिक में एएनएम सेंटर खोला गया, लेकिन उद्घाटन के दिन के बाद यह सेंटर शुरू नहीं हुआ। टीके तक गांव में नहीं लगते। वर्ष 2011 में नामिक जूनियर हाईस्कूल को हाईस्कूल का दर्जा मिला, लेकिन शिक्षकों की तैनाती नहीं हुई। हाईस्कूल को जूनियर हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक भगवान जेम्याल संचालित करते हैं। जुलाई 2017 में सामाजिक विषय के शिक्षक की तैनाती हुई है। सितंबर 2017 से मार्च 2018 तक तीन अतिथि शिक्षक हाईस्कूल में तैनात रहे, अब वह भी नहीं हैं। नामिक के लोग समस्याओं का समाधान न होने को लेकर वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव का बहिष्कार कर चुके हैं।

प्रकृति मेहरबान
जैविक खेती के लिए प्रसिद्ध नामिक में पानी की कोई कमी नहीं है। वहां के लोग खेती और भेड़पालन से गुजारा करते हैं। 600 से 700 क्विंटल आलू और 100 क्विंटल राजमा नामिक में हर साल पैदा होता है। क्वालिटी ऐसी कि खरीदार खुद नामिक पहुंचते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि उनको सरकारी योजना का कोई लाभ नहीं मिलता। न बीज मिलता है, न खाद, न फसली ऋण। गांव के लोग परंपरागत बीजों के जरिये खेती करते हैं।

नहीं पड़ी पलायन की मार
यह सुखद है कि समस्याओं के अंबार के बावजूद नामिक पर पलायन की मार नहीं पड़ी है। नामिक के 122 परिवार खेती, पशुपालन के भरोसे जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं। नामिक के 13 लोग भारतीय सेना में हैं। चार पुलिस में, एक शिक्षक, एक शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी के पद पर कार्यरत है। दो लोग सेना से सेवानिवृत्त हैं।

खुद करते हैं बिजली परियोजना का संचालन
वर्ष 2010 में हीरामणि प्रोजेक्ट नाम से नामिक में 50 किलोवाट की बिजली परियोजना का निर्माण किया गया। इसका संचालन गांव की समिति करती है। सुबह 4 से 7, शाम 5 से रात 11 बजे तक गांव को बिजली दी जाती है। प्रत्येक परिवार से प्रतिमाह 30 रुपये प्रति बल्ब वसूला जाता है। उरेडा द्वारा निर्मित परियोजना में खराबी आती है तो गांव के लोग परियोजना की स्वयं मरम्मत करते हैं।

क्या नामिक वाले इस देश के नागरिक नहीं
नामिक की प्रधान तुलसी जेम्याल उपेक्षा से बेहद आहत हैं। कहती हैं कि कभी-कभी लगता है कि क्या वह लोग इस गांव के नागरिक नहीं हैं। कहती हैं कि उन लोगों के साथ ऐसा अन्याय क्यों किया जा रहा है। सड़क स्वीकृत होने के बाद भी नहीं बनती, एएनएम सेंटर स्थापित होने के बाद भी संचालित नहीं होता।

कांग्रेस शासनकाल में नामिक के लिए दो सड़कें मंजूर हुई। धन अवमुक्त किया गया। अब बन नहीं रही हैं। नामिक की सड़कों का मामला वह सड़क से सदन तक उठाएंगे। -हरीश धामी, विधायक धारचूला
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