थल (पिथौरागढ़)। 1996 में बनी 750 किलोवाट की बरार जल विद्युत परियोजना अब ग्रामीणों के लिए अभिशाप बन गई है। परियोजना से बिजली उत्पादन तो हो रहा है, लेकिन नहर के रिसाव से बरड़ गांव में कृषि योग्य लगभग एक हजार नाली और चौनीपातल में 500 नाली कृषि भूमि दलदल में तब्दील हो गई है। इससे ग्रामीणों में आक्रोश है।
परियोजना के लिए बनाई गई नहर से वर्ष 2003 से रिसाव शुरू हो गया था। ग्रामीणों ने कई बार रिसाव को मजबूती से बंद करने की मांग उठाई। बावजूद इसके पानी रिसना बंद नहीं हुआ। ग्रामीणों ने अब रिसाव वाली जगहों के खेतों फसल उगाना छोड़ दिया है। इन जगहों पर जमीन भी धंस रही है। मौवाधार से कवौराली गैर तक बरड़ गांव के दीपक चंद, गीता चंद, प्रेम चंद, दल बहादुर चंद, प्रदीप चंद, हरि चंद, प्रताप चंद, पुष्कर चंद सहित 16 लोगों की एक हजार नाली भूमि दलदल में तब्दील हो गई है। चौनीपाताल में जगदीश राम, गणेश राम, लक्ष्मण राम, खड़क राम सहित 10 लोगों की 500 नाली भूमि कृषि योग्य नहीं रह गई है।
बरड़ में गीता चंद, बबलू सामंत और चौनीपाताल में जगदीश राम, गणेश राम के मकान में नहर के रिसाव का पानी आता है। ग्रामीण लंबे समय से मांग उठाते आए हैं कि रिसाव वाली जगहों पर उरेडा मोटे पाइप लगा कर परियोजना सुचारु रूप से चलाए। प्रत्येक बरसात में नहर टूटती रहती है और उरेडा द्वारा उसकी मरम्मत की जाती है फिर भी पानी का रिसाव बंद नहीं हो पाता है। चौनीपाताल निवासी थल की ग्राम प्रधान गीता देवी का कहना है कि शिकायतों के बाद तीन बार उरेडा के कर्मचारी जांच में आए। उन्होंने दोनों गांवों के पीड़ितों को सूचना दिए बगैर ही जांच कर नहर को रिसाव रहित दिखा दिया। पीड़ितों ने नहर से पानी के रिसाव को शीघ्र बंद नहीं किए जाने पर आंदोलन की चेतावनी दी है।
उधर, उरेडा के परियोजना अधिकारी अखिलेश कुमार शर्मा का कहना है कि नहर की मरम्मत के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है।