अस्कोट (पिथौरागढ़)। पाल राजाओं की राजधानी रहे अस्कोट का विकास आजादी के 70 साल बाद भी नहीं हो पाया है। क्षेत्र के विकास के लिए प्रशासनिक इकाई बनाने को लेकर कई बार आंदोलन छेड़ने के बाद भी यहां की जनता को कोरे आश्वासन ही मिले।
अस्कोट पाल राजाओं की राजधानी रहा है। अस्कोट परगना के अंतर्गत कनालीछीना से लेकर धारचूला के रांथी जुम्मा तक का क्षेत्र आता था। मानसरोवर यात्रा मार्ग पर स्थित होने से अस्कोट कैलाश यात्रियों का प्रमुख पड़ाव भी था। आजादी के बाद इस क्षेत्र की उपेक्षा की गई। परगना होने के बावजूद आजादी के बाद इसे प्रशासनिक इकाई नहीं बनाया गया। जनता की मांग के बावजूद ब्लॉक मुख्यालय तो दूर तहसील का दर्जा भी नहीं मिला।
प्रशासनिक इकाई बनाने को लेकर क्षेत्र की जनता ने कई बार आंदोलन किए। इसके बावजूद सत्ताधारी राजनीतिक दलों ने केवल कोरे आश्वासन देकर आंदोलन भी समाप्त करा दिए। इस उपेक्षा के कारण क्षेत्र का विकास ठप सा हो गया है। इस क्षेत्र से अधिकतर लोग अब नगरीय क्षेत्रों में जा चुके हैं। अस्कोट कस्बा सहित आसपास के गांवों में लोगों को मूलभूत सुविधाएं भी नहीं मिल पाई हैं। पानी के लिए भी लोगों को तरसना पड़ता है। अधिकतर गांव अभी सड़क से नहीं जुड़ पाए हैं। क्षेत्र के स्कूलों में शिक्षकों की कमी बनी है।
क्षेत्र की जनता को जरूरी काम के लिए ब्लॉक मुख्यालय कनालीछीना, तहसील मुख्यालय डीडीहाट जाना पड़ता है। प्रशासनिक इकाई नहीं बनने से कस्बे में बड़ा बाजार भी विकसित नहीं हो पाया। ऐसे में यहां के लोग जरूरी चीजों के लिए भी डीडीहाट या जौलजीबी की दौड़ लगाने को मजबूर रहते हैं। क्षेत्र के 95 वर्षीय लक्ष्मण पाल कहते हैं कि शासन-प्रशासन ने अस्कोट क्षेत्र की उपेक्षा की है।
अस्कोट को प्रशासनिक इकाई का दर्जा देने की मांग को लेकर आंदोलन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भीम सिंह भंडारी कहते हैं कि विकास के नाम पर क्षेत्र की जनता को कोरे आश्वासन मिले है। यदि जरूरत पड़ी तो फिर से आंदोलन शुरू जाएगा।