पिथौरागढ़। वर्ष 1962 से पहले कैलाश मानसरोवर यात्रा कई माह में पूरी हुआ करती थी। भारत-चीन-युद्ध के बाद 19 साल तक कैलाश मानसरोवर यात्रा बाधित रही। 1981 में ही यह यात्रा फिर शुरू तो हुई लेकिन कई प्रतिबंध लग गए। अब यात्रा अधिकतम 22 दिन में पूरी होती है।
फिर शुरू हुई यात्रा की अवधि जून से सितंबर तक तय की गई। यात्रियों का चयन विदेश मंत्रालय के स्तर से होने लगा। यात्रा संचालन का जिम्मा कुमाऊं मंडल विकास निगम और सुरक्षा का जिम्मा आईटीबीपी को दिया गया। लिपुलेख दर्रा पार करने के बाद तिब्बत में प्रवेश करते ही सारी व्यवस्था चीन सरकार को सौंप दी गई।
वर्ष 1962 से पहले कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए किसी तरह की अनुमति की जरूरत नहीं थी। तब नेपाल की ब्रह्मदेव मंडी से टनकपुर, गंगोलीहाट, थल, डीडीहाट, अस्कोट, नारायण आश्रम होते हुए लोग कैलाश मानसरोवर की पैदल यात्रा पर जाते थे। हल्द्वानी से अल्मोड़ा, गंगोलीहाट अथवा सेराघाट के रास्ते कैलाश मानसरोवर की राह पकड़ते थे। इतिहासकार डा. मदन चंद्र भट्ट के मुताबिक चंपावत के बालेश्वर, पनार स्थित रामेश्वर के शिव मंदिर, हाट कालिका मंदिर समेत तमाम पौराणिक स्थलों के दर्शन करते हुए यात्री कैलाश मानसरोवर पहुंचते थे। हाट कालिका मंदिर के पुजारी रिटायर्ड अपर परियोजनाधिकारी कल्याण सिंह रावल कहते हैं कि तब कैलास यात्री पौराणिक जान्हवी नौले में स्नान और मंदिर का प्रसाद का ग्रहण कर आगे बढ़ते थे।
पहले कैलाश यात्रा पूरी करने में कई महीने लगते थे। अब दिल्ली से दिल्ली वापसी तक कैलास मानसरोवर यात्रा में मात्र 22 दिन का समय लगता है। यात्री दिल्ली से काठगोदाम, अल्मोड़ा, चौकोड़ी, मिर्थी, धारचूला, मांगती तक करीब 650 किमी वाहन से और चीन बार्डर लिपुपास तक 85 किमी पैदल सफर तय कर तिब्बत में प्रवेश करते हैं।