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बेटी को पराया धन समझने की सोच बदलने की जरूरत

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अपराजिता कार्यक्रम
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पिथौरागढ़। अमर उजाला की ओर से अपराजिता-100 मिलियन स्माइल्स के तहत संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही महिलाओं, साहित्यकारों, कवियों, शिक्षाविदें सहित विभिन्न संगठनों से आए लोगों ने वर्तमान समाज और महिला हिंसा विषय पर विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि महिलाओं को हिंसा से बचाने के लिए बेटी को पराया धन समझने की सोच बदलनी होगी और इस तरह की भेदभाव वाली परंपराओं का विरोध करना होगा।
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ज्ञान प्रकाश संस्कृत पुस्तकालय बजेटी में आयोजित कार्यक्रम में पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक दिनेश पंत ने कहा कि महिलाएं शाब्दिक, मानसिक और शारीरिक हिंसा का शिकार होती हैं। समाज में जो विभाजन पुरुषों और महिलाओं के बीच किया गया है, उसे खत्म कर महिलाओं का सम्मान करना होगा। शिक्षाविद् डॉ.पीतांबर अवस्थी ने कहा कि बेटी को पराया धन मानने से ही महिलाओं के साथ भेदभाव की शुरुआत हुई। इस भेदभाव को मिटाने की जरूरत है। शिक्षिका मंजुला अवस्थी ने कहा कि महिलाओं की भावनाओं का सम्मान किया जाना जरूरी है।

छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष मुकेश पंत ने कहा कि छात्राओं-महिलाओं के साथ आए दिन हिंसा की घटनाएं होती हैं। इस तरह की घटनाओं का विरोध खुलकर करना होगा। शिक्षक दिनेश भट्ट ने कहा कि आज सामंती सोच और पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को आगे नहीं बढ़ने देता। बेरोजगारी से युवाओं में नशे की प्रवृति बढ़ रही है। कुंठित होकर पुरुष महिलाओं पर अत्याचार करता है। प्रोफेसर परमानंद चौबे ने कहा कि महिलाओं को अन्याय के खिलाफ संगठित होने की जरूरत है। रेखा जोशी ने नारी को सशक्त बनाने के लिए संस्कारवान शिक्षा पर जोर दिया। सरस्वती कोहली ने कहा कि महिला को सशक्त बनाने के लिए घर-परिवार का सहयोग जरूरी है।
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शिक्षिका आनंदी जोशी ने कहा कि एक महिला पर घर-परिवार का बंधन भी है। एक बेटी तभी सशक्त बनेगी जब उसका भाई और पिता सहयोग करेंगे। रंगकर्मी एवं कुमाऊंनी कवि जनार्दन उप्रेती ने कहा कि संस्कारों की कमी, शराब और नशाखोरी की प्रवृति से देवभूमि में भी महिला हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह चिंता का विषय है। कवियित्री लक्ष्मी आर्या ने कहा कि परिवार में मां और बेटी की बातें भी सुनीं जानी चाहिए। प्रोफेसर कमल देवलाल ने आरोप लगाया कि सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है। लिंग समानता की बात नहीं की जाती है। डॉ.प्रमोद श्रोत्रिय ने कहा कि महिलाओं को आर्थिक आजादी देने की भी जरूरत है।

प्रवक्ता चिंतामणि जोशी ने कहा कि पुरुषों द्वारा किए गए अत्याचार का डर महिलाओं के भीतर तक है। इस डर को बाहर निकालने के लिए पुरुषों को ही आगे आना होगा। संवाद कार्यक्रम में कवि प्रकाश जोशी, तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित हेमा थलाल, माधवी जोशी, दीपा अवस्थी, इंदू वर्मा, मोहनी देवी, जयश्री लोहनी, तुलसी देवी, राजेश मोहन उप्रेती, ललित शौर्य मौजूद थे। अंत में सभी ने महिला हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने की शपथ भी ली।
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