अस्कोट (पिथौरागढ़)। ऐतिहासिक जौलजीबी मेले की शुरूआत 1871 में मार्गशीष संक्रांति के दिन अस्कोट के राजा पुष्कर पाल ने ज्वालेश्वर मंदिर में पूजा कर कराई थी। राजा की ओर से मेले में आने वाले व्यापारियों और जनता के लिए काली और गोरी नदी के बगड़ में भोजन और रहने की व्यवस्था की जाती थी।
उस समय राजा की ओर से तिब्बत के व्यापारियों को सामान के साथ मेले में आने का निमंत्रण भेजा जाता था। व्यापारी इस करार पर आते थे कि मेले में उनका जो सामान बच जाएगा उसे राजा खरीद लेगा। तिब्बत से व्यापारी पत्थर वाला नमक, सुहागा, छिरबी, दन, थुलमा, चुटका आदि लेकर आते थे। टनकपुर, लोहाघाट और अन्य मैदानी क्षेत्रों से व्यापारी तांबे, लोहे के बर्तन लेकर पहुंचते थे।
मेला एक माह से अधिक समय तक लगता था। मेले में भारत-तिब्बत और नेपाल के लोग बढ़ी संख्या में पहुंचते थे। रात में हुड़के की थाप पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था। दारमा घाटी की दानवीर जसुली सौक्याणी तिब्बत से सामान लेकर व्यापार करती थी। मेले में जग्यूड़ा की मूंगफली खूब बिकती थी। अस्कोट से नीचे गर्जियाधार में मेले में आने वाले लोगों के लिए प्याऊ लगाया जाता था। 1975 से सरकार ही इस मेले की व्यवस्था संभाल रही है।
जॉल खंपा, बीच खंपा के नेतृत्व में आते थे व्यापारी
क्षेत्र के 95 वर्षीय बुजुर्ग लक्ष्मण सिंह पाल बताते हैं कि तिब्बत से व्यापारी जॉल खंपा और बीच खंपा के नेतृत्व में जौलजीबी मेले में आते थे। गोला, मिश्री, उच्च गुणवत्ता के दन सस्ते दामों में मिल जाते थे। जोग्यूड़ा से बगड़ीहाट के सेरे तक उन्नत नस्ल के पशुओं की प्रदर्शनी लगती थी।