पिथौरागढ़। धारचूला की व्यास घाटी में 14 से 26 अगस्त तक विशेष पारंपरिक पूजा का आयोजन होगा। खास बात यह है कि इस पूजा में घाटी के सभी सात गांवों के लोग चाहे वह देश में हों या विदेश में, उनका उपस्थित रहना आवश्यक होता है। पूजा के अंतिम दिन महर्षि वेद व्यास की पूजा की जाती है। पूजा की इस अवधि में अन्य सभी कार्य वर्जित होते हैं।
मान्यता है कि क्षेत्र के बाहर से आने वाले देवी-देवता व्यास घाटी से ही भगवान शिव की पूजा करने को कैलाश पर्वत पर जाते हैं। गर्ब्यांग में सभी देवी-देवता एकत्र होते हैं और शिव के प्रमुख गण नम्ज्युंग की आराधना कर उनसे कैलाश जाने की अनुमति देने की प्रार्थना करते हैं।
नम्जुंग की अनुमति मिलने के बाद ही उनके नेतृत्व में आगे की यात्रा पर जाते हैं। इस अवधि में बाहर से आने वाले देवी-देवता स्थानीय आराध्य देवों का आतिथ्य स्वीकार करते हैं। सदियों पुरानी इस परंपरा में लोग स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं। इसमें माटी, गब्ला, नम्ज्युंग, सिद्ध, न्युग्तन्ग, रौ सै, लंगा, ननम्ती, स्यंसै देवी, गन्गरी, थक्पंग देवी-देवताओं की पूजा कर क्षेत्र की खुशहाली और परिवार की सुख, समृद्धि की कामना की जाती है। व्यास घाटी के कुटी, नाभी, रौंगकोंग, गुंजी, नपलच्यू, गर्ब्यांग और बूंदी गांवों के हजारों लोग इस पूजा में हिस्सा लेते हैं।
पूजा का प्रारंभ 14 अगस्त से होगा। 26 अगस्त को महर्षि वेद व्यास की पूजा होगी। कहा जाता है कि द्वापर युग के महाभारत काल में महर्षि वेद व्यास यहां आए थे। उन्होंने छियालेख में विश्राम किया और बाद में गुंजी आकर ओम पर्वत के पास स्थित गुफा में ध्यान लगाया। बाद में इस गुफा को व्यास गुफा के नाम से ही जाना जाने लगा। इस बार विशेष पूजा में क्षेत्र के करीब चार-पांच हजार लोगों के पहुंचने की उम्मीद है।