पिंडरघाटी में 16 और 17 जून को आपदा की मार से बेहाल प्रभावित अब भी सरकारी स्कूलों में शरण लिए हुए हैं। आशियाना और रोजगार गंवा चुके इन लोगों के सामने अब भविष्य की चिंता सता रही है। बच्चों की पढ़ाई से लेकर शादी, विवाह को लेकर लोग परेशान हैं।
जिंदगी कैंप में गुजर रही है
लेकिन हालात कहीं से भी दिलासा देते नजर नहीं आ रहे हैं। पीड़ितों के तन पर कपड़े ही शेष बचे है। प्रशासन ने भी त्वरित मदद के नाम पर सिर्फ 27 सौ रुपये, एक-एक कंबल और टेंट के सहारे छोड़ दिया है। आशियाने से लेकर रोजगार छिनने के बाद जिंदगी कैंप में गुजर रही है। लेकिन ऐसा ठोस प्रयास अभी तक नहीं हो पाया, जिससे इन लोगों में कोई उम्मीद जगे।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
पिंडरघाटी में पिंडर नदी के ऊफान ने देवाल से लेकर नारायणबगड़ तक बर्बादी से यहां के जीवन चक्र को हिला कर रख दिया। पूरे क्षेत्र में 70 से अधिक परिवार पूरी तरह से बेघर हो चुके हैं।
कैंप और सगे-संबंधियों के यहां प्रभावित रह रहे हैं। लेकिन इन लोगों की आगे की जिंदगी कैसे कटेगी इसको लेकर शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने कोई योजना अभी तक नहीं बनाई है।
राजस्व विभाग ने निरीक्षण किया था
नारायणबगड़ में पांच दुकानें और आवासीय मकान आपदा में गंवा चुके बीएस रावत ने बताया कि आपदा के बाद राजस्व विभाग ने निरीक्षण किया था। फिर प्रशासन ने लोगों को 27 सौ रुपये राहत राशि दी। लेकिन अब उन्हें उनके भाग्य पर छोड़ दिया गया है। उर्मिला मेहरा कहती है आपदा ने बच्चों के भविष्य को भी लील लिया है।
स्कूल खुलने को सप्ताहभर का समय रह गया है। लेकिन इस संबंध में प्रशासनिक स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहा है। युवा जयवीर कंडारी, भगत सिंह नेगी का कहना है कि प्रभावितों को रुपये, पैसे नहीं बल्कि शासन, प्रशासन का एक विश्वास चाहिए, जिससे वे अपनी जीवन को दुबारा शुरू कर सके।
रवैया उपेक्षित ही रहा है
प्रभावित गंगा सिंह रावत, बृजभूषण, हरेंद्र सिंह, सुरेंद्र सिंह, सबर सिंह, कर्ण सिंह आदि का कहना है कि अभी तक तो प्रशासन का रवैया उपेक्षित ही रहा है। दुबारा हालचाल पूछने की किसी भी अधिकारी ने जरूरत नहीं समझी है। उधर तहसील मुख्यालय थराली का तो आपदा ने भूगोल ही बदला हुआ है। यहां 34 आवासीय मकान और दुकानें जमींदोज होकर पिंडर में समा चुकी है। लेकिन यहां भी प्रभावित भगवान भरोसे हैं।
प्रशासन ने मस्जिद मार्केट और मुस्लिम बस्ती को खाली करने के निर्देश तो दे दिए हैं। लेकिन इन लोगों को कहां शिफ्ट किया जाए, इसका निर्णय नहीं लिया है।
प्रभावित प्रेम सिंह, गोपाल दत्त, सफीना, सुलेमान, जुल्फिकार, मोबीन आदि का कहना है कि फौरी राहत तो मिली है। लेकिन कब तक कैंप में रहेंगे, इसका जबाब किसी के पास नहीं है। मुस्लिम बस्ती और मस्जिद मार्केट को खाली करने को कहा तो गया है।
कहां शिफ्ट किया जाएगा?
लेकिन यहां रहने वालों को कहां शिफ्ट किया जाएगा, यह भी नहीं बताया जा रहा है। देवाल ब्लाक के ओडर, लिंगणी, तोरती, हरमल, रामपुर ग्राम पंचायतों का ब्लाक और तहसील से संपर्क कटा हुआ है। लेकिन यहां आज तक प्रशासन का कोई भी अधिकारी नहीं पहुंचा है। सबसे बड़ी समस्या है कि इन गांवों में खाद्यान्न संकट गहरा गया है। ग्रामीण घर के अनाज से ही जीवन यापन करने को मजबूर है।
रोजमर्रा के उपयोग के कई चीजें खत्म हो गई हैं। लेकिन पिंडर नदी के दूसरे पार कैसे पहुंचे, इसके लिए वैकल्पिक इंतजाम भी नहीं हो पाए हैं। ग्रामीण कंचन दानू, हुकुम सिंह आदि का कहना है कि गांवों के सभी झूला पुल बह चुके हैं। देवाल, ग्वालदम और थराली से संपर्क पूरी तरह से कट चुका है।
घरों के अनाज से गुजारा हो रहा है। हालत यह है कि गांवों में उबले आलू और चौलाई (रामदाना) के सहारे कई परिवार अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं। प्रशासन की अभी तक कोई व्यवस्था नहीं है। सिर्फ त्वरित सहायता मिली है, वह भी कस्बों में बांटी गई है। गांवों में कोई अधिकारी नहीं पहुंचा है। लोगों का जीवन अब सिर्फ भगवान भरोस चल रहा है।
- सुशील रावत पूर्व प्रमुख थराली
ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार संपर्क किया जा रहा है। ऋषिपुल का जायजा लिया है। ओडर सहित अन्य गांवों का निरीक्षण किया जा रहा है। प्रयास किए जा रहे हैं कि वैकल्पिक रास्तों से इन गांवों तक राशन पहुंचाया जाय। मुस्लिम बस्ती और मस्जिद मार्केट को खाली करने को कहा गया है। यहां के लोगों जीआईसी थराली व तलवाड़ी में शिफ्ट किया जा रहा है।
- विवेक प्रकाश उप जिलाधिकारी थराली