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अनुभव प्रमाणपत्र मांगे जाने पर नर्सिंग डिग्रीधारियों में आक्रोश

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प्रदेश के राजकीय चिकित्सालयों में स्टाफ नर्स की भर्ती प्रक्रिया में नर्सिंग डिग्री, डिप्लोमाधारियों से 1 साल के अनिवार्य अनुभवपत्र मांगे जाने पर उन्होंने आक्रोश जताया। कहा कि पहाड़ में एक भी निजी अस्पताल नहीं है। ऐसे में अनुभव प्रमाणपत्र की अनिवार्यता बेरोजगार डिग्री व डिप्लोमाधारियों के लिए भर्ती में शामिल होने से रोकने का प्रयास है। कहा कि नर्सिंग के पदों पर ही संविदा नियुक्ति के लिए कोई अनुभव प्रमाणपत्र नहीं मांगा जा रहा है। यह एक पद पर सरकार की दोहरी नीति को दर्शा रहा है।
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एलिंग वेलफेयर नर्सेज फाउंडेशन के प्रदेश अध्यक्ष बबलू, प्रदेश उपाध्यक्ष नंदन, सचिव मनीषा अधिकारी व जिलाध्यक्ष आशीष डोभाल ने कहा कि सरकार ने राजकीय चिकित्सालयों में स्टाफ नर्स के 1238 पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की है। भर्ती प्रक्रिया में अभ्यर्थियों से 30 बेड या उससे अधिक के अस्पताल में एक साल तक कार्य करने के अनिवार्य अनुभव प्रमाणपत्र की बाध्यता भी रखी है। कहा कि उत्तराखंड नर्सिंग काउंसिल में पंजीकृत 25 फीसदी युवा एक वर्ष के अनिवार्य अनुभव की शर्त के कारण परीक्षा में नहीं बैठ पा रहे हैं। नर्सिंग कोर्स के दौरान उनका 70 फीसदी समय अस्पताल में क्लीनिकिल कार्यों में लगता है। कोर्स के अंत में 6 महीने की इंटर्नशिप में एक प्रशिक्षित नर्स के समान अस्पताल में ड्यूटी करते हैं। ऐसे में 1 साल का अतिरिक्त अनुभव मांगा जाना उचित नहीं है। इस निर्णय के कारण वह भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा ही नहीं ले पा रहे हैं। उन्होंने सरकार से भर्ती प्रक्रिया में 1 साल के अनिवार्य अनुभव अर्हता को समाप्त करने की मांग की। फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने अनुभव प्रमाणपत्र की बाध्यता समाप्त नहीं करने पर कोर्ट जाने की चेतावनी भी दी।
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