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...फूलों की जब चाह मुझे थी तब कांटे भी नहीं मिले

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हिमालय साहित्य एवं कला परिषद की ओर से प्रकृति के चितेरे कवि चंद्र कुंवर बत्र्वाल के जन्म दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस मौके पर चंद्र कुंवर को याद कर उनकी कविता का पाठ किया गया।
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शुक्रवार को श्रीकोट गंगानाली में हिमालय साहित्य एवं कला परिषद की ओर से कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में कहा गया कि चंद्र कुंवर बत्र्वाल (1919-1947) हिंदी के कवि थे। 28 साल की अल्पआयु में दुनिया से विदा होने से पूर्व वह हिंदी साहित्य को अनमोल कविताओं का समृद्ध खजाना देकर गए। समीक्षक चंद्र कुंवर को हिंदी का कालिदास मानते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति प्रेम झलकता है। वक्ताओं ने रोष जताया कि स्कूली पाठ्यक्रम में हिमवंत कवि चंद्र कुंवर की न तो कविताएं शामिल की गईं और न ही उत्तराखंड साहित्य अकादमी का नाम की घोषणा फलीभूत हो पाई।
कार्यक्रम में गढ़ कवि देवेंद्र उनियाल ने चंद्र कुवर की कविता अब छाया में गुंजन होगा वन में फूल खिलेंगे..., त्रिलोक दर्शन थपलियाल ने फूलों की जब चाह मुझे थी तब कांटे भी नहीं मिले...नरेश नौटियाल ने मैं नहीं चाहता युग-युग तक पृथ्वी पर जीना, पर उतना जी लूं जितना जीना सुंदर हो.... महेश गिरि ने मैं बैठकर नवनीत कोमल फेन पर शशि विंब सा... सुनाई। इस अवसर पर जसपाल सिंह गुसाईं, हेम चंद्र ममगाई व आकाश रावत आदि मौजूद थे।
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