श्रीनगर। इस वर्ष पितृ पक्ष 26 सितंबर से पूर्णिमा श्राद्ध के साथ शुरू होकर 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ संपन्न होगा जिसमें तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान का विशेष महत्व है।
कमलेश्वर निवासी आचार्य आनंद प्रकाश नौटियाल ने बताया कि गया जी से पिंडदान की शुरुआत होकर काशी, प्रयागराज, हरिद्वार-ऋषिकेश और अंत में बदरीनाथ धाम स्थित ब्रह्मकपाल में महापिंडदान का विधान है। इस दौरान दक्षिण दिशा की ओर मुख कर जल, काले तिल और कुश से तर्पण किया जाता है तथा दिवंगत परिजनों की तिथि पर सात्विक भोजन, ब्राह्मण भोज, दान और पंचबलि की परंपरा निभाई जाती है। उन्होंने कहा कि पितृ पक्ष को केवल कर्मकांड के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह परिवार की पिछली पीढ़ियों को याद करने और उनके प्रति सम्मान व कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर भी है। श्रद्धालुओं को अपनी पारिवारिक परंपरा और योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करना चाहिए।