गढ़वाल विवि के अर्थशास् विभाग में चल रही कार्यशाला
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सामुदायिक खेती व बेहतर प्रबंधन से हिमालयी क्षेत्र में कृषि की चुनौतियों को अवसरों में बदला जा सकता है। यह बात रविवार को भारतीय अर्थशास्त्र परिषद और एचएनबी गढ़वाल (केंद्रीय) विवि के अर्थशास्त्र विभाग की ओर से आयोजित भारत में कृषि करण बदलाव एवं ग्रामीण विकास परराष्ट्रीय संगोष्ठी में दिल्ली विवि के प्रो.एचडी पोखरिया ने कही।
गढ़वाल विवि के चौरास प्रेक्षगृह में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार को समापन हो गया है। अंतिम दिन 100 से अधिक शोध पत्र पढ़े गए। दूसरे दिन दो मंथन सत्र हुए। प्रथम सत्र पर्वतीय कृषि एवं चुनौतियों पर केंद्रित था। जिसमें विषय विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्रों में कृषि की संभावनाओं और चुनौतियों पर मंथन किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए दिल्ली विवि के प्रो.एचडी पोखरियाल ने कहा कि हिमालयी कृषि की चुनौतियों को अवसरों में बदला जा सकता है। बशर्ते यहां सामुदायिक खेती व बेहतर प्रबंधन का मॉडल लागू किया जाए। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिक प्रभारी डा.आरके मैखुरी ने कहा कि उनका संस्थान कृषकों के साथ मिलकर परंपरागत कृषि को बाजार की कृषि में बदलने के लिए काम कर रहा है। इसके सार्थक परिणाम दिखाई दे रहे हैं। एनके सिंह ने फल संस्करण के माध्यम से कृषकों की आर्थिकी को बढ़ावा देने पर जोर दिया। डा. वीके पुरोहित ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के कृषकों की आय बढ़ाने के लिए औषधीय पदों के कृषिकरण की बात कही। हिमालय जियोलॉजीके विशेषज्ञ डा. एसपी सती ने कहा कि आपदा की सबसे अधिक मार कृषकों और उनकी खेती पर पड़ रही है। जंगली जानवरों ने कृषि को काफी प्रभावित किया है। इसके पश्चात तकनीकी सत्रों का आयोजन हुआ। जिसमें कृषि अवसर पर चर्चा हुई। गौर विवि सागर के प्रो.जीएम दुबे, हिमाचल विवि शिमला की प्रो.अपर्णा नेगी और गढ़वाल विवि के प्रो.एससी बागड़ी ने अलग-अलग सत्रों की अध्यक्षता की। इस अवसर पर पूर्व कुलपति प्रो.बीके नौडियाल, कार्यशाला संयोजक प्रो.पीएस राणा, आयोजन सचिव प्रो.एमसी सती व डा. प्रशांत कंडारी आदि ने विचार व्यक्त किए।