प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर और पर्यावरणीय दृष्टि से स्वच्छ लैंसडौन पर्यटकों को ही नहीं बल्कि हिमालयी ग्रिफिन गिद्धों को भी भा रहा है।
क्षेत्र के डेरियाखाल और धूरा गांव में संकटग्रस्त प्रजाति में शामिल इन गिद्धों को देखा जा सकता है। विशेषज्ञ इसे अच्छा संकेत मान रहे हैं।
पहले पहाड़ों में हर जगह दिखाई देने वाले गिद्ध अब नजर नहीं आते हैं। पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा के चलते लगातार इनकी संख्या घटती जा रही है।
लेकिन सफाई कर्मचारी के नाम से जाने जाने वाले गिद्ध का लैंसडौन क्षेत्र पसंदीदा स्थान बना हुआ है। सर्दियों के तीन से चार महीने तक इन गिद्धों को डेरियाखाल, लैंसडौन और धूरा गांव के आसपास देखा जा सकता है।
इनका 10-15 का झुंड है। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार 4000 मीटर की ऊंचाई वाले स्थानों पर हिमालयी क्षेत्रों में इन गिद्धों की प्रजाति पाई जाती है।
लेकिन अधिक बर्फ पड़ने और ठंढ बढ़ने से यह गिद्ध निचले स्थानों की तरफ रुख कर जाते हैं। पर्यावरणविद् डा. नागेंद्र सिंह के अनुसार यह प्रजाति उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती है।
इसे संकट ग्रस्त प्रजाति के रूप में शामिल किया गया है। जानवरों में टीकाकरण और अन्य बीमारियों के लिए दिए जाने वाली दवाइयों के चलते भी इन गिद्धों पर संकट मंडराया है।
लुप्ती के कगार पर पहुंचे इन गिद्धों का लैंसडौन के क्षेत्र में पिछले कई सालों से दिखाई देना पारिस्थितिकी तंत्र के लिए शुभ संकेत है।