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पलायन रोकने को चुनें मनपसंद उम्मीदवार : गणेश

Sat, 28 Jan 2017 10:08 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, पौड़ी
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गणेश गरीब। - फोटो : amar ujala.
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उत्तराखंड में 75 प्रतिशत पलायन और 98 फीसदी खेती चौपट हो चुकी है। यदि चकबंदी के लिए सरकारों और जनप्रतिनिधियों की ओर से सार्थक प्रयास होते तो गांव के गांव आज खाली नहीं होते। विधानसभा चुनाव में हमारे पास मताधिकार के रूप में ब्रह्मास्त्र है। क्यों न आज हम पलायन को रोकने के लिए काम करने के इच्छुक उम्मीदवार को वोट दें।
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चाहे वे किसी भी दल से हों। यह बात अमर उजाला से विशेष बातचीत में चकबंदी प्रणेता के नाम से विख्यात पौड़ी के विकासखंड कल्जीखाल के गांव सूला निवासी गणेश गरीब (80) ने कही।

गणेश गरीब दिल्ली में इलेक्ट्रानिक का कारोबार करते थे। गांव से हो रहे पलायन को रोकने के लिए वर्ष 1981 में वह गांव लौट आए और चकबंदी में चंदन वाटिका के नाम से प्रयोगशाला भी चलाई। उन्होंने गांव की बंजर भूमि में माल्टा, सेब, खुमानी, पुलम, आडू़, संतरा इत्यादि पहाड़ी फलों को उगाया।
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पुलम तो काफी मात्रा में पैदा होने लगा। फलों को मार्केट में बेचा। गांव के 14-15 परिवारों ने उनकी देखादेखी बंजर भूमि पर बगीचे खड़े कर दिए। इससे कुछ हद तक उनके गांव से पलायन रुका। लेकिन सुविधाओं के अभाव और सरकार की तरफ से चकबंदी के लिए सार्थक प्रयास नहीं होने से लोग गांव छोड़ते चले गए।  

ऐसे लगेगा पलायन पर विराम
पौड़ी। चकबंदी प्रणेता गणेश गरीब कहते हैं कि चकबंदी से युवाओं को सरकारी योजनाओं के संचालन में मदद मिलेगी। एक साथ खेत होने से बगीचे तैयार करने में सहूलियत होगी। इसमें कुछ युवा कृषि उत्पाद से जुड़ेंगे तो कुछ विपणन, कुछ पशुपालन से जुड़ेंगे। ये सारे उद्यम गांव में चलने से और आय के स्रोत बढ़ने से गांव से पलायन रुकेगा।

वर्ष 1980 से कर रहे चकबंदी की मांग
पौड़ी। गणेश गरीब वर्ष 1980 से चकबंदी की मांग सरकारों से करते आ रहे हैं। कहते हैं तत्कालीन यूपी सरकार के वक्त गढ़वाल मंडल मेें चकबंदी के लिए पौड़ी जनपद में तो कुमाऊं के लिए अल्मोड़ा में कार्यालय खोला गया। उत्तराखंड बनने के बाद से पहाड़ में चकबंदी के लिए कोई कोम नहीं हुए। अभी हाल ही में गैरसैंण में विधानसभा सत्र में चकबंदी कानून और भूमि सुधार बिल लाया गया था। यदि सरकारों ने इस तरफ सार्थक काम किया होता तो परिणाम काफी सुखद होते।
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