पौड़ी। उत्तराखंड राज्य गठन व राज्य निर्माण के बाद गैरसैंण राजधानी समेत अन्य मुद्दों को लेकर जन संघर्ष के प्रेणता बाबा मथुरा प्रसाद बमराड़ा पंचतत्व में विलीन हो गए। उनकी मौत पर पौड़ी में शोक की लहर है। स्वयं तिल-तिल जलकर बाबा बमराड़ा ने अपना जीवन उत्तराखंड की सेवा के समर्पित कर किया।
पौड़ी जिले की पट्टी इडवालस्यूं के गांव पणिया में 1941 में कुलानंद बमराड़ा व माता परमेश्वरी के घर जन्मे मथुरा प्रसाद की मां का बचपन में ही निधन हो गया। पांचवीं तक अध्ययन के बाद बाबा ने यूपी के मथुरा से संस्कृत में शास्त्री की उपाधि ली। इसके बाद दिल्ली में नौकरी की तलाश की, लेकिन नौकरी नहीं मिली। फिल्मों में रुचि के चलते वह मुंबई चले गए। मुंबई ने भी निराश किया और उन्होंने दिल्ली में चश्मे की कंपनी खोल दी। एक दिन दुकान में अचानक आग लगने से सब कुछ राख हो गया। इसके बाद उनका राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ दिल्ली में आना जाना हुआ। संघ के समाचार पत्र पांचजन्य पुस्तकालय के संरक्षण की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। उनकी मुलाकात मजदूर संघ के संयोजक दत्तोपंत ठेगड़ी से हुई। ठेगड़ी ने मथुरा की क्षमता को देखते हुए उन्हें मजदूर संघ की जिम्मेदारी सौंप दी। 70 के दशक में बाबा ने दिल्ली के प्रवासियों को संगठित कर एक समिति का गठन किया। स्व. दाताराम डोभाल, श्याम सिंह पंवार, मथुरा प्रसाद बमराड़ा व भवानंद शर्मा को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। भारतीय मजदूर संघ के संयोजक दत्तोपंत ठेगड़ी उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन की बात कहते थे जिससे बाबा के मन में पृथक उत्तराखंड का बीज अंकुरित होने लगा। समिति ने दिल्ली में प्रवासी उत्तराखंडियों से वोट क्लब में जुटने की अपील की। हजारों लोग जमा हुए और पहली बार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दिल्ली में उत्तराखंडियों की मजबूती का अहसास हुआ। पृथक राज्य के प्रति लोगों की भावनाओं को देखते हुए ऋषि बल्लभ सुंद्रियाल ने उत्तराखंड राज्य परिषद का गठन किया। युवा मथुरा को अध्यक्ष चुना गया और कृपाल सिंह व मदनमोहन नौटियाल को महामंत्री। परिषद की बागडोर पौड़ी सांसद प्रताप सिंह नेगी को सौंपी गई। दो जनवरी 1994 में बाबा ने पौड़ी में राज्य निर्माण को लेकर अनशन आरंभ किया। अनशन को व्यापक समर्थन मिला। तब राम दयाल सिंह पटवाल, गोपाल सिंह रावत, गोविंद लाल ढींगरा ने बाबा मथुरा प्रसाद बमराड़ा व सुंदरी देवी से निवेदन किया कि वे भूख हड़ताल समाप्त कर दें। आयुक्त सिंघा व डीएम हेमेंद्र कुमार ने बाबा व सुंदरी देवी को जूस पिलाकर 20 जनवरी 1994 को भूख हड़ताल समाप्त करवाई। मुज्जफरनगर कांड के बाद बाबा बेहद उग्र आंदोलन का हिस्सा रहे और उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिला। बाबा के संघर्ष का परिणाम रहा कि पृथक राज्य अस्तित्व में आया। राज्य बनने के बाद गैरसैण राजधानी की मांग को लेकर वह भी आंदोलनरत रहे।