आंखों में डर। भूख और प्यास से बेहाल। लेकिन आपदा के कहर से बच निकलने का संतोष। अब बच्चों के लिए पानी और दूध के इंतजाम के लिए भागदौड़। यही दिखा केदारनाथ यात्रा के दौरान गुप्तकाशी, गौरीकुंड, रामपुर सहित अन्य स्थानों से सुरक्षित निकालकर भागीरथीपुरम खांडखाला में बनाए गए राहत शिविर में।
'उत्तराखंड में कहर' अपडेट के लिए क्लिक करें
प्रशासन, टीएचडीसी और बांध निर्माण में लगी कंपनियों की ओर से यात्रियों के खाने-पीने की व्यवस्था देख तीर्थयात्रियों के आंखों में आंसू छलक आए। ये नई उम्मीदों के आंसू थे।
बारिश शुरू हो गई थी
गौरीकुंड में चार दिन से फंसी रही राजस्थान की सुधा देवी कहती है कि यह दूसरा जीवन है। केदारनाथ से 15 जून को पांच बजे शाम गौरीकुंड़ पहुंची तो बारिश शुरू हो गई थी। देखते-देखते चारों तरफ तबाही का मंजर था। जयपुर राजस्थान की चंद्रकांता सेन और लक्ष्मी शर्मा ने बताती है कि उनके सामने ही उनकी 52 सीटर गाड़ी बारिश के तेज बहाव में बह गई है।
शुक्र है कि तब गाड़ी में नहीं बैठे थे। वह बताती है, कि उनके सामने ही दो बड़ी पार्क़िग, घोड़े-खच्चर और सैकड़ों लोग बह गए। जोधपुर राजस्थान के मुकेश पुरोहित और हरीश उपाध्याय बताते हैं कि तीन दिनों तक जंगल में भटकते रहे। स्थानीय ग्रामीण मदद नहीं करते तो शायद जिंदा नहीं बच पाते। साथ के 17 लोगों का पता नहीं चल पा रहा है।
हिंडोन राजस्थान की गायत्री और प्रिया ने बताया कि त्रियुगीनारायण में अपने 10 साथियों के साथ फंसे रहे।
उत्तराखंड अपडेटः दांव पर लगीं 70 हजार जिंदगियां
बच्चे चिल्लाते रहे
होटल वालों ने उनकी सहायता की। पंजाब अबोहर के डा. परमानंद धूड़िया, उड़ीसा के हरीशंकर भंडारी ने बताया कि खाने-पीने की व्यवस्था न होने से बच्चे चिल्लाते रहे। दवाइयां न मिलने से भी परेशानी रही। इसके सब के बावजूद जान बच गई, यही ईश्वर का बड़ा वरदान है।
भाई का नहीं लग पा रहा पता
दिल्ली से जयपाल सिंह बृहस्पतिवार को आठ बजे सुबह अपने भाई भीम सिंह की तलाश में भागीरथीपुरम पहुंचा, तो वह डीएम और एसपी के सामने फफक-फफक कर रो पड़ा। बताया कि शनिवार 12 बजे भाई से बात हुई थी, तब वह गौरीकुंड में थे। उसके बाद उनका मोबाइल स्विच ऑफ बता रहा है। जिससे सारे परिजनों के रो-रोकर बुरा हाल है।