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जवान जंगल बने धुंध के आगे दीवार

Tue, 08 Nov 2016 01:52 AM IST
विजेंद्र श्रीवास्तव
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जंगल - फोटो : amar ujala
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उत्तराखंड में दिल्ली जैसे हालात फिलहाल नहीं  हैं, उसका एक बड़ा कारण यहां के जवान जंगल हैं। यह जंगल ही हैं, जो धुंध के व्यापक असर को रोकने में मददगार साबित हुए हैं। पंत नगर विश्वविद्यालय के मौसम विभाग वैज्ञानिकों के अनुसार हालांकि धुंध के कारण धूप की तीव्रता (सन रेडिएशन) पर आंशिक असर हुआ है।
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 उत्तराखंड के दिल्ली जैसे गैस चैंबर में तब्दील होने की स्थिति यहां फिलहाल नहीं आ पाई है। पंत नगर विवि के मौसम वैज्ञानिक के अनुसार यहां भी धुंध के कारण धूप की तीव्रता(सन रेडिएशन) पर आंशिक असर हुआ है, लेकिन यहां की जमीन पर लगे जवान जंगल धुंध के कहर के आगे दीवार बन गए हैं।

पंत नगर विश्वविद्यालय के मौसम विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अजीत सिंह नैन कहते हैं कि दिल्ली में धुंध की वजह केवल किसानों द्वारा जलाई गई पराली ही नहीं है, बल्कि कूड़ा, क्षतिग्रस्त सड़क आदि भी हैं।
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सड़क आदि टूटने से जो गर्द उठती है, उसमें बेहद छोटे कण (सस्पेंडिड पार्टिकल) होते हैं यह वायुमंडल में मौजूद नमी के साथ मिलकर हाइड्रोस्कोपिक क्रिया करते हैं और धुंध का आकार ले लेते हैं।

डा. नैन कहते हैं कि उत्तराखंड में धुंध के कारण धूप की तीव्रता के आंशिक असर की बात को छोड़ दें तो कोई व्यापक असर नहीं है। इसका एक बड़ा कारण हमारे प्रदेश के लकदक जंगल हैं। यह पेड़ काफी मददगार साबित हुए हैं।

इसके अलावा हमारे यहां के किसान तुलनात्मक तौर जागरूक भी हैं। पर कूड़ा, गंदगी आदि को लेकर लोगों को और जागरूक होना होगा। वन संरक्षक पश्चिमी वृत्त डा. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि दिल्ली में भी काफी जंगल है, लेकिन उस जंगल का बड़ा हिस्सा पुराना होने के कारण कार्बन सोखने की क्षमता कम है।

जबकि हमारे आरक्षित वन क्षेत्र में निश्चित अंतराल में पेड़ों का कटान और पौधरोपण होता है, जिसके कारण जंगल में वृक्षों की औसत आयु 30 से 35 साल है, इसके कारण इन जंगलों में कार्बन अवशोषित करने की क्षमता ज्यादा है। जंगल के कारण धुंध का असर नहीं हो सका है।  
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