‘जा चेला जा अगल जनम मे लै तू फौजी बन्ये, दुश्मनों को मारिए देशक रक्षा करिए मेर एक चेल न्हेगो मगर कई च्येल दिगो’ ( मेरे बेटे जा अगले जनम में भी तू फौजी बनना।
देश के दुश्मनों को मारना, भारत माता की रक्षा करना मेरा एक बेटा चला गया, लेकिन मेरे कई वीर सैनिक बेटे हो गए हैं’। जांबाज मोहन के घर की चौखट पर चार दर्जन से अधिक सेना के जवान और अधिकारी मौजूद हैं।
जो मोहन के पार्थिव शरीर को लेकर आए हैं। जिंदगी की अंतिम सांस तक बेटे की जुदाई का सामना करने को विवश हो चुकी मां राधिका का जिगर फौलादी है। आखिर उसकी कोख से एक वीर सैनिक ने जो जन्म लिया है।
बूढ़ी मां को ढांढस बंधाने के लिए किसी के पास कोई शब्द नहीं थे। मां ने अपनी पोती ओर बहु को देखा तो लगा मोहन के बाद उसे ही इनकी देखभाल करनी है।
सीने में पत्थर रखकर मां आगे बढ़ी और बेटे मोहन को अंतिम विदाई देने का साहस कर दिखाया। मां के साहस को देख हर कोई यही बोला, आखिर शेर को जन्म देने वाली शेरनी ही होती है।
अब भावना के आगे पहाड़ सी जिंदगी मुंह बांए खड़ी है। बूढ़ी सास को सहारा देने और बेटी भूमिका की बेहतर परवरिश की जिम्मेदारी अब भावना के कंधों पर आ पड़ी है।
पति की शहादत से मूर्छित भावना को जैसे-तैसे होश में लाया गया। आंख खुली तो एकदम स्तब्ध ना बोल सकी ना सुन सकी। भावना की नजर कभी विलाप करती बूढ़ी सास पर टिकती तो कभी अपनी बच्ची को निहारने लगती।
कभी पति के शव पर लिपट कर विलाप करती तो कभी आसमान को देखती। सूनी कलाईयों पर नजर पड़ते ही बेहोश हो जाती। बमुश्किल होश में आने पर फिर अपने आप से सवाल करती।
शहीद मोहन के परिजनों को उनकी अंतिम निशानी भेंट की गई। सेना के जवानों ने जांबाज मोहन के परिजनों को तिरंगा, सेना की टोपी, बेल्ट और बैज भेंट किया गया। शहीद के भाई शंभुनाथ ने सेना के अधिकारियों से निशानी हासिल की।
शहीद मोहन के घर को जाने वाले मार्ग का नाम शहीद मोहन नाथ मार्ग रखा जाएगा। कैबिनेट मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल ने कहा कि सरकार शहीद के परिजनों को हर संभव सहायता देगी। उन्होंने कहा कि शहीदों का बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है।