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UK: चौखट पार करके...जब महिलाओं ने संभाली परिवार की कमान, परेशानियों के बावजूद हार नहीं मानी; जानें इनकी कहानी

Fri, 24 Oct 2025 11:24 AM IST
हीरा मेहरा अमित गंगोला

सार

घर की चौखट तक सिमटी महिलाओं ने संघर्षों का डटकर सामना किया है। भाई दूज के दिन जब अधिकांश महिलाएं रीति-रिवाज निभा रही थीं, ये बहनें पेट्रोल पंप और ऑटो-रिक्शा चलाकर अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। जानें इनकी कहानी...।
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सुनीता आर्या। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कभी चौखट तक सिमटी रहने वाली महिलाएं अब हौसले की हांडी में पकाई उम्मीद की खीर से न सिर्फ अपने परिवार का जीवन मीठा बना रही हैं बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का स्वाद भी छोड़ रही हैं। कठिनाइयों की आंच पर भी इन्होंने हिम्मत को ठंडा नहीं पड़ने दिया। भाई दूज के दिन जब महिलाएं अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर लंबी उम्र की दुआ कर रही थीं तब शहर की तीन बहनें जीवन के संघर्षों में खुद ही अपने परिवार की ढाल बनी हुई दिखीं। कोई पेट्रोल पंप पर वाहनों में ईंधन डाल रही थी तो किसी ने टुकटुक में सवारी बैठाई थी। 

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ई-रिक्शा चालक सुनीता
नथुवाखान की रहने वाली सुनीता आर्य शादी के बाद गोरापड़ाव आ गईं। वह परिवार के साथ बेहतर कल के सपने बुन ही रही थीं कि बीमारी ने पति को छीन लिया। छह साल तक उन्होंने घरों में कामकाज कर तीन बच्चों की परवरिश की लेकिन कोरोना काल में यह भी छूट गया। इस पर उन्होंने ई-रिक्शा चलाने का निर्णय लिया और किराये का वाहन चलाने लगीं। 45 वर्षीय सुनीता बताती हैं कि शुरुआत में उनको समाज के ताने झेलने पड़े लेकिन मेहनत रंग लाई। तीन साल बाद उन्होंने अपना ई-रिक्शा खरीद लिया। उनकी बेटी पढ़ाई कर रही है जबकि दोनों बेटे बिजली की दुकान चला रहे हैं। उन्होंने जमीन खरीदकर अपना घर भी बना लिया है।

सेल्सगर्ल कंचन
ओखलकांडा निवासी कंचन रावत शहर के देवलचौड़ स्थित इंडियन ऑयल पेट्रोल पंप पर काम करती हैं। किसान पिता पर पांच बच्चों की जिम्मेदारी होने के कारण कंचन ने 12वीं के बाद आगे की पढ़ाई के सपने को छोड़ परिवार का सहारा बनने का निर्णय लिया। कंचन बताती हैं कि उनके तीन छोटे भाइयों की पढ़ाई और घर के खर्चे की जिम्मेदारी उन पर है। कहती हैं कि उनके मन में आज भी कॉलेज जाने और पढ़ाई पूरी करने की इच्छा है लेकिन घर की जिम्मेदारी के बोझ ने उनके कदम रोक रखे हैं।
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बस परिचालक पूनम
उत्तराखंड परिवहन निगम में परिचालक पूनम पिछले चार महीने से दिल्ली रूट पर ड्यूटी कर रही हैं। शादी से पहले उन्होंने निजी चिकित्सालय में नर्स का काम किया। हल्द्वानी रोडवेज वर्कशॉप में कार्यरत उनके पति की एक साल पहले मृत्यु हो गई थी। पति के निधन के बाद तीन बच्चों और ससुर-सास की जिम्मेदारी पूनम के कंधों पर आई। वह कहती हैं कि उनके पास हार मानने का वक्त नहीं था। बच्चों की आंखों में उम्मीद देख वह हर दिन आगे बढ़ने की ताकत पाती हैं। इस सफर में सास-ससुर और सहकर्मी उन्हें पूरा सहयोग करते हैं।

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