शहर की सफाई व्यवस्था भगवान भरोसे ही है। नगर निगम क्षेत्र में आबादी के लिहाज से सफाई कर्मचारियों की जबर्दस्त कमी है। दशकों से कर्मियों की भर्ती नहीं हुई है। आबादी बढ़ने के साथ कर्मचारियों की संख्या लगातार कम हो रही है। खामियाजा जनता भुगत रही है। शहर में कूड़े के ढेर लगे हैं। कूड़ा उठवाने के लिए कर्मचारी नहीं हैं।
नगर निगम क्षेत्र की आबादी चार लाख से अधिक पहुंच चुकी है। नगर निगम में मात्र 332 नियमित सफाई कर्मी हैं। नियमानुसार 10 हजार की आबादी में 28 कर्मचारियों की तैनाती, यानी 357 की आबादी में एक कर्मचारी होना चाहिए। लेकिन नगर निगम में 1204 लोगों की आबादी में एक कर्मचारी है। मानक से करीब चार गुना अधिक दबाव है। कर्मचारियों की कमी पूरी करने के लिए 43 कर्मचारी संविदा और 65 कर्मचारी स्वच्छता समितियों के माध्यम से सफाई कार्य करते हैं।
सफाई व्यवस्था की मानीटरिंग करने के लिए हर वार्ड में एक सुपरवाइजर और तीन निरीक्षक हैं। शहर में 25 वार्ड हैं। नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. तुहिन कुमार के मुताबिक मैनपावर की कमी है। हर साल नियमित कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं। नियमानुसार आबादी के हिसाब से हल्द्वानी में कम से कम 1100 सफाई कर्मचारियों की जरूरत है। लेकिन स्वच्छता समितियों, संविदा और नियमित कर्मचारियों की कुल संख्या करीब 440 है। निगम में जितने संसाधन और मैनपावर है उसी से व्यवस्था दुरुस्त करने का प्रयास किया जा रहा है।
डस्टबिन और कूड़ा घर नहीं होते खाली
शहर में 43 डस्टबिन लगे हैं। इनमें 37 डस्टबिन सड़क के ऊपर रखे हैं जबकि छह डस्टबिन भूमिगत हैं। डस्टबिन नियमित रूप से सुबह और शाम खाली होने चाहिए। लेकिन कर्मचारियों की कमी होने से कई दिनों तक डस्टबिन का कूड़ा नहीं उठता है। इसी तरह चार कूड़ा घर हैं। इनमें आसपास के डस्टबिन का कूड़ा फेंका जाता है। इनकी तो हफ्तों तक सफाई नहीं हो पाती है।
महीनों तक नहीं मिलता है वेतन
नगर निगम आर्थिक कंगाली के दौर से गुजर रहा है। विकास कार्य कराना तो दूर कर्मचारियों को वेतन के लिए तीन तीन महीने इंतजार करना पड़ता है। हर महीने वेतन नहीं मिलने से स्वच्छता समितियों और संविदा कर्मियों का चूल्हा जलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में अस्थायी कर्मचारी दूसरी जगहों पर ठेके पर काम ले लेते हैं।