हल्द्वानी। महिला के प्रसव को लेकर तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं। प्री मैच्योर प्रेगनेंसी में आखिर नार्मल डिलीवरी क्यों की गई। महिला का अल्ट्रासाउंड कलर डापलर के साथ क्यों नहीं कराया गया। सीजिरियन डिलीवरी करके महिला को बचाया जा सकता है।
अल्मोड़ा निवासी दीपक वर्मा की पत्नी ललिता वर्मा गर्भवती थी। अल्मोड़ा में उसका इलाज चल रहा था। ललिता की तबियत बिगड़ने पर उसे एसटीएच रेफर किया था। दीपक का कहना था कि अल्मोड़ा के डाक्टरों ने आपरेशन से डिलीवरी कराने की सलाह दी थी।
पत्नी ललिता को 14 जून को एसटीएच में भर्ती कराया गया। 15/16 जून की देर रात प्रसव के बाद ललिता को अधिक रक्त स्राव होने लगा। काफी प्रयास के बाद भी ललिता को नहीं बचाया जा सका। सवाल ये उठता है कि डाक्टरों ने 14 जून को ललिता का कलर डापलर के साथ अल्ट्रासाउंड क्यों नहीं किया। अल्ट्रासाउंड होने पर प्लेसेंटा और अक्रीटा की स्थिति का पता चल जाता।
प्लेसेंटा और अक् रीटा की स्थिति का पता चलने पर डाक्टर अगर सीजिरियन डिलीवरी करते और ललिता की हालत बिगड़ती तो यूटरस बाहर कर बचाया जा सकता था। प्री मैच्योर प्रेगनेंसी होने के कारण सीजिरियन करने का प्रयास करना चाहिए था। निजी डाक्टरों की मानें तो 34 सप्ताह (8 माह से अधिक) की प्रेगनेंसी होने पर नार्मल डिलीवरी का प्रयास किया जाता है।
सिजीरियन करने पर मुख्य वेसेल्स को बांधकर ब्लीडिंग को रोका जा सकता था या स्थिति बिगड़ने पर यूटरस हटाया जा सकता था। एसटीएच के एमएस डा. एके पांडे ने बताया कि पूरी घटनाक्रम की एक रिपोर्ट तैयार की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर मजिस्ट्रेटी जांच के दौरान जांच कमेटी के समक्ष पेश कर देंगे।