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ढोलक बस्ती का कौन सुनेगा दुख-दर्द

Sat, 23 Jul 2016 12:15 AM IST
निशांत खनी
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ढोलक बस्ती - फोटो : अमर उजाला
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बरसात में ढोलक बस्ती के लोग कीड़े मकोड़ों की तरह जिंदगी जीने को मजबूर हैं। बस्ती रेलवे की भूमि पर काबिज है। इस कारण आज तक बस्ती में बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच सकीं। बरसात में बस्ती जलमग्न और झोपड़ियां डूबी हैं। दूषित पानी पीने और मच्छरों के प्रकोप से संक्रामक बीमारियां फैली हैं। अधिकतर परिवारों में बच्चों से लेकर बूढ़े तक मलेरिया, डायरिया और पीलिया से पीड़ित हैं।
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जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अफसर तो दूर स्वयंसेवी संस्थाएं भी बस्ती तक नहीं पहुंच सकी हैं। बस्ती के लोगों को देवभूमि के मसीहा (नेताओं और अफसरों) का इंतजार है, ताकि उन्हें नरक से मुक्ति मिल सके। ढोलक बस्ती हल्द्वानी रेलवे स्टेशन की चहारदीवारी से सटी है। बस्ती में करीब 11 सौ की आबादी है और करीब 600 मतदाता हैं।

अधिकतर लोगों की आजीविका ढोलक बनाकर बेचकर ही चलती है। कुछ लोग मजदूरी भी करते हैं। जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को बस्ती में मूलभूत सुविधाओं से कोई सरोकार नहीं है। नेता सिर्फ चुनाव में वोट मांगने जाते हैं। बस्ती ढलान में बसी है, जिसमें बरसात होने पर पानी भर जाता है। मानसून की बारिश में बस्ती के लोग नारकीय जीवन बिता रहे हैं।  
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झोपड़पट्टी की तंग गलियां कीचड़ से भरी हैं। बस्ती में हर चौथे झोपड़े के बीच एक गड्ढा बना है। गड्ढों में पेयजल लाइन की टोंटी लगी है। लाइन में पानी का प्रेसर काफी कम है, लिहाजा गड्ढा भरने पर ही लोग उससे पीने का पानी बर्तनों में भरते हैं। बरसात में गड्ढे भी कीचड़ से भरे हैं। पेयजल लाइन में भले ही पानी नहीं आता है, लेकिन बरसात के बाद गड्ढों में भरा दूषित पानी पूरी लाइन में घुस रहा है। दूषित पानी पीने और गंदगी में मच्छरों के पनपने से बस्ती में दर्जनों लोग डायरिया, पीलिया और मलेरिया से पीड़ित हैं। बस्ती में फॉगिंग तो दूर स्वास्थ्य विभाग से कैंप तक नहीं लगता है। बस्ती के शब्बू, शहबाज, अलताफ और रानी का कहना है कि उन्हें नरक से मुक्ति चाहिए। इसके लिए मसीहा (नेताओं) की नींद खुलने का इंतजार है। 
  मेयर डॉ. जोगेंद्र सिंह रौतेला ने बताया  नगर निगम ने ढोलक और गफूर बस्ती के परिवारों के पुनर्वास के लिए राजीव आवास योजना में 52 करोड़ की डीपीआर बनाई गई। इसमें ढोलक बस्ती के 736 परिवार शामिल थे, जबकि काठगोदाम से लेकर हल्द्वानी तक रेलवे बस्ती के किनारे बसे 1385 परिवारों के पुनर्वास के लिए डीपीआर में शामिल किया था। भूमि की उपलब्धता नहीं होने से पुनर्वास की योजना लटक गई। प्रदेश सरकार भूमि उपलब्ध कराती है तो सबका आवास योजना में एसडीएम, पंकज उपाध्याय ने कहा, मानवीय दृष्टिकोण से बस्ती के परिवारों का पुनर्वास होना चाहिए। रेलवे भूमि होने से बस्ती में सरकार के स्तर से मुहैया कराई जाने वाली सुविधाएं नहीं हैं। बस्ती की भूमि को लेकर मामला कोर्ट में विचाराधीन है। प्रशासन ने बस्ती की वस्तुस्थिति शासन को अवगत करा दी है। 
  बस्ती में हदीस है एकमात्र पढ़ालिखा
  बस्ती में हदीस ही एकमात्र युवक है, जो इंटर तक पहुंचा है। बस्ती के बच्चे स्कूल जाने के बजाए ढोलक बनाने और बेचने में घर परिवार का हाथ बंटाते हैं। बस्ती के पास दो आंगनबाड़ी सेंटर हैं। दोनों ही आंगनबाड़ी में करीब 45 बच्चे हैं। हदीस के मुताबिक बस्ती में 5वीं से अधिक कोई नहीं पढ़ पाया है। उसने भी हाईस्कूल के बाद परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी के लिए रेग्यूलर पढ़ाई छोड़ दी। अब प्राइवेट से इंटर की पढ़ाई कर रहा है। 
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