पौराणिक सिद्धेश्वर मंदिर को संरक्षित करने की अमर उजाला की पहल रंग लाने लगी है। मंगलवार को पुरातत्व विभाग की टीम पड़ताल के लिए सिद्धेश्वर पहुंची। टीम को मंदिर से जुड़े कई एतिहासिक एवं पौराणिक अवशेष मिले। टीम की प्रारंभिक जांच के मुताबिक सिद्धेश्वर मंदिर 9वीं शताब्दी का है। कत्यूरी शासनकाल में सिद्धेश्वर में छोटे और बड़े कई मंदिरों का समूह रहा होगा। जिसमें मुख्य मंदिर भगवान भोले शंकर का था। टीम अपनी रिपोर्ट उत्तराखंड राज्य संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग और भारत सरकार को भेजेगी।
सिद्धेश्वर मंदिर कालाढूंगी से करीब आठ किमी दूर कोटाबाग मार्ग पर है। ब्रह्म बूबू मंदिर के पास ही सिद्धेश्वर के लिए बायीं तरफ से कच्चा मार्ग है। मंदिर घने जंगल के बीच है। मंदिर के तीन तरफ जलधाराएं हैं, जो करड़ा स्रोत से आती हैं। मंदिर का कोई ढांचा नहीं है। खुले आसमान के नीचे ही जगह-जगह पत्थर पूजा होती है। कोटाबाग, कालाढूंगी, कमौला, धमौला के ग्रामीणों की मंदिर से श्रद्धा जुड़ी है। मंदिर से तमाम किंवदंतियां भी जुड़ी हैं। ग्रामीणों की मदद से ही मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। मंदिर के आसपास उसकी पौराणिकता के साक्ष्य आज भी मौजूद हैं।
अमर उजाला ने 25 मई को मंदिर के पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व की जानकारी पाठकों तक पहुंचाने की पहल की थी। इसके बाद रुद्र सोसायटी हल्द्वानी ने भी अमर उजाला की पहल पर मंदिर जाने वाले मार्ग पर जगह-जगह बोर्ड लगाए, ताकि श्रद्धालु जंगल में रास्ता न भटकें। सोसायटी अध्यक्ष गुलाब सिंह नेगी ने संस्कृति विभाग के सचिव से भेंट कर अमर उजाला में प्रकाशित मंदिर के पौराणिक महत्व की जानकारी दी।
राज्य संस्कृति विभाग के आदेश पर मंगलवार को अल्मोड़ा जाखनदेवी से पुरातत्व की टीम क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी चंद्र सिंह चौहान के नेतृत्व में सिद्धेश्वर पहुंची। टीम में जेई किशन किशोर हिंदवाल, दीवान सिंह, चंदन राम शामिल थे। टीम ने रुद्र सोसायटी अध्यक्ष गुलाब सिंह नेगी, मोहन बिष्ट और कमल परिहार को भी मंदिर में बुलवाया। टीम को दो घंटे की पड़ताल के बाद मंदिर से जुड़े कई ऐतिहासिक अवशेष मिले। पुरातत्व अधिकारी के मुताबिक मंदिर के आसपास मिले अवशेष धरोहर हैं, जिनका संरक्षण जरूरी है।