नैनीताल विधानसभा सीट में कांग्रेस को पटखनी देने के लिए जहां भाजपा को प्रत्याशी के रूप में मजबूत चेहरे की तलाश है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के सामने अपनी जीत को बरकरार रखने की चुनौती। मुकाम को मंजिल तक पहुंचाने के लिए अंदरखाने भाजपा ने न केवल रणनीति तैयार कर ली है बल्कि उस पर अमल भी शुरू कर दिया है।
भाजपा में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त सामने आ रही है जबकि कांग्रेस से सरकार में शामिल एक मंत्री के बेटे और सीटिंग एमएलए समेत अब तक इक्का-दुक्का नाम ही प्रत्याशी के रूप में चर्चाओं में हैं। उक्रांद (पवार) ने नैनीताल सीट पर अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है, जबकि उक्रांद ऐरी गुट से एक नाम की चर्चा है।
बताते चलें अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौर में भाजपा नेता बंशीधर भगत ने लगातार तीन बार नैनीताल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता था, लेकिन अलग राज्य बनने के बाद वर्ष 2002 में हुए चुनाव में नैनीताल सीट से उक्रांद प्रत्याशी डा. नारायण सिंह जंतवाल ने कांग्रेस की जया बिष्ट को हराकर यहां उक्रांद का परचम लहराया।
तब बसपा यहां तीसरे नंबर पर रही थी। 2007 में हुए चुनाव में भाजपा के खड़क सिंह बोहरा ने उक्रांद को पटखनी देकर इस सीट पर भाजपा की वापसी करा दी, लेकिन 2012 के चुनाव में कांग्रेस की सरिता आर्या ने जीत दर्ज कर भाजपा और उक्रांद दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।
इस बार भाजपा का प्रयास किसी भी कीमत पर कांग्रेस से नैनीताल सीट को छीनने का है। भाजपा से दावेदारों के रूप में मोहन पाल, पूर्व ब्लाक प्रमुख अंबा आर्या, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्षा बीना आर्या, पूर्व चेयरमैन संजय कुमार संजू, हेम आर्या, पूर्व जिलाध्यक्ष दिनेश आर्या, राकेश कुमार, अशोक कुमार और प्रकाश आर्या के नाम चर्चाओं में हैं, जबकि कांग्रेस से दावेदारों के रूप में कबीना मंत्री यशपाल आर्या के बेटे संजीव आर्या, सीटिंग एमएलए सरिता आर्या समेत जिला पंचायत सदस्य पीसी गोरखा और अखिल भारतीय अनुसूचित जाति जनजाति संगठन के केएल आर्या का नाम दावेदार के रूप में सामने आया है।
उक्रांद पवार गुट नैनीताल सीट से जगमोहन को प्रत्याशी घोषित कर चुका है, जबकि उक्रांद ऐरी गुट से वर्तमान पालिकाध्यक्ष श्याम नारायण का नाम प्रमुख दावेदार के रूप में लिया जा रहा है। बसपा से दावेदारों के रूप में अब तक जोनल कार्डिनेटर भुवन आर्या के अलावा शारदा आर्या, लीलाधर आर्या समेत एक सेवानिवृत्त अधिकारी का नाम भी चर्चा में है।\
भाजपा को लगता है कि पिछले चुनाव में उसका चुनावी प्रबंधन ठीक न होने के कारण उसे हार का मुंह देखना पड़ा। इससे सबक लेते हुए इस बार भाजपा बूथ स्तर से ही चुनावी प्रबंधन को मजबूत करने के साथ साथ प्रत्याशी के रूप में ऐसे चेहरे की तलाश में है जो कांग्रेस पर भारी पड़े।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में चुनाव को लेकर अभी गहमागहमी नजर नही आ रही है। अब देखना यह है कि 2017 का चुनावी ऊंट किस करवट बैठता है।