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मुझमें और किस्मत में यही जंग रही, मैं उसके फैसलों से तंग वो मेरे हौसले से दंग रही

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नैनीताल। राजनीति का भरोसा नहीं कब किसे फर्श से अर्श पर तो किसी को अर्श से फर्श पर पहुंचा दे। तमाम उदाहरण हैं जहां किसी सीट से प्रत्याशी हर चुनाव जीता तो किसी को कभी जीत नहीं मिली। कोई पहला चुनाव जीत कर सीएम बन गया तो कोई कई चुनाव जीत कर भी मंत्री तक न बन सका।
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हेम आर्या का राजनीतिक करियर देखें तो उनसे भी किस्मत सदैव रूठी ही नजर आई। राजनीति के चस्के में उन्होंने अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ी, बाद में राजनीति के लिए घर, होटल, जमीन सब बिक गए। हेम खुद दावा करते हैं कि राजनीति और समाज सेवा के शौक ने उन्हें आज सड़क पर ला दिया है अब उनके पास कुछ नहीं बचा है। इतना जरूर है कि हर बार अपनी या पत्नी की चुनाव में हार या टिकट न मिलने पर भी हेम पूरे मनोयोग और परिश्रम से अपने क्षेत्र में लगातार सक्रिय अवश्य रहे।
हेम आर्या वन विभाग की अपनी सरकारी नौकरी छोड़ 1992 से समाज सेवा में आ गए थे। वर्ष 2000 से वे राजनीति में सक्रिय हुए और भाजपा में जिला मंत्री, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, प्रदेश महामंत्री रहे। भाजपा ने उन्हें 2012 में नैनीताल विधानसभा से टिकट भी दिया लेकिन वे कांग्रेस प्रत्याशी सरिता आर्या से पराजित हो गए। भाजपा ने इससे पूर्व उनकी पत्नी नीमा आर्या को 2009 और 2014 में दो बार जिला पंचायत अध्यक्ष का टिकट भी दिया लेकिन एक बार मात्र एक और एक बार दो वोट से वो चुनाव हार गईं।
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2017 के चुनाव में हेम आर्या का विधायकी का टिकट पक्का था। इस बार भाजपा की जबरदस्त लहर भी थी और हेम के साथ पिछले चुनाव में मामूली हार को लेकर सहानुभूति भी थी लेकिन टिकट चुनाव से चंद रोज पहले ही भाजपा में शामिल हुए संजीव आर्य को मिला और हेम की उम्मीदों पर पानी फिर गया। क्षुब्ध होकर हेम ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे। इस लगन के बाद इस बार उन्हें कांग्रेस से टिकट मिलने और जीतने की पूरी उम्मीद थी लेकिन एक बार फिर भाजपा से कांग्रेस में गए संजीव के ही कारण उन्हें टिकट मिलने की संभावना धूमिल हो गई। इन हालातों में उनका राजनीतिक करियर डांवाडोल हो गया, जिसके बाद अब वे फिर भाजपा में शामिल हुए हैं।
तीन बार चंद रोज पूर्व पार्टी में आये लोगों से पिछड़े हेम, नीमा
नैनीताल। इसे किस्मत का खेल न कहें तो क्या कहें कि हेम और उनकी पत्नी तीन बार उन लोगों के चलते जीत से वंचित रहे जो चंद रोज पहले ही पार्टी में आए या चुनाव में सक्रिय हुए थे। 2014 के जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस से विजयी रहीं सुमित्रा प्रसाद भाजपा में थीं और देवलचौड़ से जिपं सदस्य थीं। नीमा आर्या भाजपा से अध्यक्ष पद की दावेदार थीं। नामांकन के पहले दिन कांग्रेस ने सुमित्रा प्रसाद को पार्टी में लेकर अध्यक्ष का टिकट दे दिया। चार दिन पूर्व पार्टी में आईं सुमित्रा चुनाव जीत गईं और नीमा पराजित हो गईं। 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा में रहे हेम वर्षों से क्षेत्र में सक्रिय थे, जबकि कांग्रेस से सरिता आर्या मात्र 15 दिन पूर्व चुनाव में सक्रिय हुईं। यहां वे तब क्षेत्र के ज्यादातर क्षेत्रों तक से अनभिज्ञ थीं। मतदाताओं से सीधी पहचान भी कम थी लेकिन चुनाव वे ही जीतीं। 2017 के चुनाव में मात्र 15 दिन पूर्व पार्टी में आए संजीव ने हेम है राजनीतिक गणित बिगाड़ दिया और इस बार फिर वही कहानी दोहराई गई। अब हेम भले ही भाजपा में आ गए हैं लेकिन फिलहाल उन्हें टिकट मिलने की संभावना कम ही नजर आ रही है।
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