पिथौरागढ़, चमोली और सोमेश्वर में बादल फटने से भारी तबाही हुई है। अगर इस खतरे के मद्देनजर नैनीताल जिले को देखा जाए, तो बादल फटने का खतरा अन्य जगहों की तुलना में कम है। वैज्ञानिक इसके पीछे एक बड़ा कारण मानते हैं कि नैनीताल और आसपास में एक की जगह पर बड़े जलस्रोत नहीं हैं।
आर्य भट्ट प्र्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जहां पर बडे़ जलस्रोत और आसपास पहाड़ होते हैं, वहां पर बादल फटने की घटना का खतरा ज्यादा होता है। जब गर्मी पड़ती है तो पानी वाष्पीकरण कर ऊपर उठता है और बादल में तब्दील हो जाता है। अगर आसपास ऊंची पहाड़ियां है तो उन बादलों को फैलने की जगह नहीं मिलती और यही वजह बनती है बादल फटने की घटना का। एरीज के मौसम विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष नाजा कहते हैं कि इसी दृष्टि से नैनीताल में तुलनात्मक तौर पर बादल फटने जैसी घटना का होने की आशंका कम है।
यहां पर नैनी झील, भीमताल, सातताल आदि झीलें हैं, लेकिन यह अलग-अलग और दूरी पर स्थित हैं। इनका आकार भी कम है। एक जगह पर बड़ी जल निधि के तौर पर मौजूद नहीं है। इसके मद्देनजर यहां पर वाष्पीकरण के बाद बड़े पैमाने पर बादल बनने और फटने का खतरा कम है। इसके अलावा एक निश्चित तापमान, आर्द्रता आदि भी बादल फटने के फैक्टर में शामिल होते हैं।
बस्तड़ी और नौलड़ा में नदी मौजूद
हल्द्वानी। पिथौरागढ़ में बस्तड़ी और नौलड़ा जहां पर बादल फटने की घटना हुई है, वहां पर नदी मौजूद है। स्थानीय लोगों के अनुसार बस्तड़ी के पास ही तलहटी में चरमा नदी है तो नौलड़ा के पास रामगंगा है, जो कि महाकाली में मिलती हैं।
क्या होता है बादल का फटना
मौसम विभाग का कहना है कि यदि 10 मिनट के भीतर किसी खास एरिया में 100 से लेकर 120 मिलीमीटर तक बारिश हो जाए तो उसे बादल फटना कहते हैं। बादल फटने की घटनाएं उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में होती हैं। पहाड़ की भौगोलिक स्थित ऐसी होती है कि किसी एक स्थान पर बादलों का प्रेशर जमा हो जाता है और वह एक ही स्थान पर पानी बरसने लगता है।