चंपावत
- जिले के 61 गांवों के लोग सड़क के लिए तरसे।
- 11 हजार से अधिक की आबादी रोजमर्रा झेलती है सड़क न होने से परेशानी।
इन गांवों को सड़क का इंतजार
गोलडांडा, कलियाधूरा, तोलारौकुड़ी, खेतिया, घडयूड़ा, पलाड़ा, शिपटाडा, सेला, मल्लातोला, कैडाईजर, बोलना, नौलियागांव, बोराबगड़, सलयानी, कलजाख, अमोड़ा, बरमसकार, टकनागूंठ, बयाला, आमखर्क, मथियाबांज के पाटली, बकोडिय़ा, तलाड़, बुंगा दुर्गापीपल, सील, रौकुंवर, रियांसी बमनगांव, बकोड़ा, मटकांडा, सौराई, रूइयां, आमनी, गंगसीर, खिरद्वारी, पोथ, खेत गांव, सेलागाड़, कोटकेंद्री, कुकड़ौनी, बगेड़ी, आगर, हैडिंगा, बैरा, लमकन, अमोन, सुकरिया, पनतौला, खुलकना, ग्वानी, मरथपला, स्यूतौला, बसेड़ी, खटगरी, सूना गांव, बकरौला, डांडा, मथार, अकरी, मोष्टी, बांस और मोस्टा।
अल्मोड़ा
- 2184 गांव वाले अल्मोड़ा जिले में 405 गांवों तक नहीं पहुंची सडक।
- 04 से 10 किमी पैदल चलने के लिए मजबूर 3246 की आबादी।
- 89 गांव सर्वाधिक साल्ट ब्लॉक के हैं जो नहीं जुड़ पाए सड़क से। इनमें खदेरागांव, रगडगाड़, बरहलिया, बांगीधार, मयालगांव शामिल।
ब्लॉकवार सड़क विहीन गांव
ब्लॉक गांव
सल्ट 89
धौलादेवी 67
स्याल्दे 61
ताड़ीखेत 41
लमगड़ा 38
भिकियासैंण 29
भैंसियाछाना 28
ताकुला 27
चौखुटिया 10
द्वाराहाट 09
हवालबाग 06
बागेश्वर
- 159 गांवों को है सड़क का इंतजार
- जिले के 947 गांवों में से दाबू, हड़ाप, कुंवारी, बोरबलड़ा, डांगती, हवेलियां भैड़ी समेत 159 गांव सड़क सुविधा से वंचित ।
- गरुड़ के दाबू, हड़ाप और कपकोट के कुंवारी, बोरबलड़ा जाने के लिए लोगों को आठ से दस किमी पैदल चलना पड़ता है।
ब्लॉकवार सड़क विहीन गांव
ब्लॉक गांव
बागेश्वर 59
कपकोट 46
गरुड़ 44
ऊधमसिंह नगर
- गूलरभोज के हरिपुरा जलाशय पार जंगल में बसे सात गांवों कोपा लाल सिंह (कोपा शांतिपुरी), कोपा मुनस्यारी, कोपा बसंता, नया प्लॉट, सेमलचीड़, कठपुलिया, ककराला टिब्बी छह हजार की आबादी कच्चे रास्ते पर निर्भर।
- गदरपुर में यूपी की सीमा पर स्थित ग्राम पंचायत बकैनिया के ग्राम अब्दुल्ला नगर से दुर्गा।
- कालोनी को जाने वाला मार्ग जर्जर। सकैनिया मिलक खानम मोटर मार्ग से ग्राम अब्दुल्ला नगर से दुर्गा कालोनी की 400 मीटर लंबी सड़क कच्ची
- 3828 आबादी वाले सितारगंज के गोठा गांव के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत मंजूर सड़क वन अधिनियम के चलते नहीं बनी।
- टांडा रेंज, पीपलपड़ाव रेंज, डौली रेंज में बसी गूजर बस्तियों में रहने वाले लोग जंगल में कच्ची सड़क से आवाजाही के लिए मजबूर।
‘250 की आबादी वाले सभी गांव सड़कों तक जुड़ गए’
राज्य बनने के बाद से सड़कों के काम में तेजी आई है। 1998 से पहले राष्ट्रीय हाइवे नहीं थे लेकिन राज्य बनने के बाद सड़कों का जाल तेजी से फैला। 1998 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के दूसरे फेज में 250 की आबादी वाले सभी गांव आज सड़कों से जुड़ चुके हैं। जो बचे हुए हैं वह तोक हैं जिनमें जनसंख्या काफी कम है। हालांकि पलायन आयोग ने किस तरह रिपोर्ट तैयार की है यह देखने वाली बात है। अधिकतर योजनाएं कागज पर बनती हैं लेकिन धरातल पर क्या हो रहा है यह देखना होगा। आज यह स्थिति यह है कि सड़क बनने के बाद रिवर्स माइग्रेशन हो रहा है जो अच्छी बात है। - बीसी बिनवाल, सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, हल्द्वानी।
सड़क विहीन गांव के लोगों का जीवन मुसीबतों से भरा है। लोग गांव छोड़ने के लिए मजबूर हैं। लोगों ने पिथौरागढ़, हल्द्वानी, बरेली, दिल्ली जैसे शहरों का रुख कर लिया है।
- ब्रजमोहन कड़ाकोटी
चंपावत के पास के कलजाख गांव तक सड़क की आस करते-करते दस साल से अधिक बीत गए। चुनाव बहिष्कार की धमकी का भी असर नहीं हुआ। चार किलोमीटर से अधिक की पैदल दूरी को पार करना नियति बन गई है। - नारायण जोशी, कलजाख।
सड़क नहीं होने से गांव के लोगों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। सालों से सड़क की मांग कर रहे हैं। अब सभी ग्रामीण लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करेंगे। - भगवती तुलेड़ा, प्रधान, कोकिलागांव, लमगड़ा।
सड़क न होने से ग्रामीणों को चार किमी पैदल चलना पड़ता है। बुजुर्गों और मरीजों को दिक्कत होती है। मरीजों को डोली पर अस्पताल पहुंचाया जाता है। न जाने कब हमारा गांव सड़क से जुड़ेगा। - जीवन चंद्र बुधानी, गैरा, रानीखेत।