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खामोशियां ही बेहतर हैं, शब्दों से लोग रूठते बहुत हैं

Thu, 29 Oct 2015 01:21 AM IST
अनूप वाजपेयी/अमर उजाला, हल्द्वानी।
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 पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के मौन और खामोशी में कितना शोर छिपा है, इसका अंदाजा सरकार और कांग्रेस दोनों को है। तिवारी बारह दिन पहले अपने गृह जनपद नैनीताल आए थे अपने 90वें जन्मदिन को सेलीब्रेट करने, लेकिन लगातार जारी इस दौरे के एक-एक दिन ने सरकार और उत्तराखंड कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाई है।
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तिवारी की नाराजगी और नाखुशी के मायने पूरी कांग्रेस जानती है। तभी एक ओर हल्द्वानी में वरिष्ठ मंत्री इंदिरा हृदयेश और दुर्गापाल उन्हें मनाने में तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री हरीश रावत और चिकित्सा शिक्षा मंत्री हरक सिंह उनकी मांगों की सूची पर मुहर लगाने में जुटे रहे।

तिवारी के 90 साल की उम्र में नैनीताल (हल्द्वानी) में इस तरह से सक्रिय होने और उत्तराधिकारी के तौर पर बेटे रोहित शेखर को लांच करने से साफ  है कि वे अब 2017 की तैयारी में है। तिवारी खुलकर कांग्रेस से दूरियां भी नहीं बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस को इशारे-इशारे में विकल्प के तौर पर समाजवादी पार्टी का डर भी दिखा रहे हैं।
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बेटे को साथ में लेकर मुंह पर पट्टी बंाधकर तिवारी विपक्ष के नेता की तरह सरकार की कार्यप्रणाली और व्यवस्था पर हमला कर रहे हैं।

तिवारी का पहली पत्नी सुशीला तिवारी के नाम से चल रहे अस्पताल से भावनात्मक लगाव हो सकता है, पर अस्पताल की जिन सुविधाओं और मांगों को लेकर उन्होंने मुंह पर पट्टी बांधी है उसके लिए सरकार या कोई भी मंत्री शायद इंकार नहीं करता।

जन्मदिन समारोह को सपा के हाईजैक करने और निर्माणाधीन अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के उद्घाटन जैसी घोषणा ने सरकार और कांग्रेस की फजीहत कराई, बावजूद इस पर कोई प्रतिक्रिया न देकर खुद को तिवारी से जोड़े रखने की कोशिश की गई।

तिवारी का उनके कार्यकाल की लंबित योजनाओं और उनके समय में शुरू की गई योजनाओं को लेकर बढ़ी दिलचस्पी से साफ  है कि कहीं न कहीं उन्होंने राजनीतिक कसरत शुरू कर दी है।

कांग्रेस के स्थानीय नेता भी इसे भांप गए हैं, लेकिन राजनीति के माहिर तिवारी अभी तक ताश के बंद पत्तों के साथ ही बाजी लंबी खींचना चाह रहे हैं। किसी ने ठीक कहा है कि खामोशियां ही बेहतर हैं, शब्दों से लोग रूठते बहुत हैं।
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