विदेशों तक सप्लाई होने वाले गौलापार के टमाटर उत्पादक किसान सरकारी मशीनरी की उदासीनता और किसानों के प्रति उनकी बेरुखी से खासे मायूस हैं। तराई में कुल उत्पादक भूमि का 50 फीसदी से अधिक रकबा गौलापार, चोरगलिया में है। इसमें भी 50 फीसदी से टमाटर और 30 फीसदी से अधिक क्षेत्र में प्याज की खेती की जाती है। टमाटर, प्याज समेत तमाम तरह की सब्जी उत्पादक किसानों को न तो मंडी में उचित मूल्य मिलता है और न ही सरकार और कृषि विभाग द्वारा उनके उत्पादों की बिक्री का उचित मूल्य दिलाने के कोई प्रयास किए गए हैं। जिससे क्षेत्र के किसान खासे मायूस हैं।
सिंचाई विभाग के सूत्रों के मुताबिक तराई में कुल 1470 हेक्टेयर कृषि भूूमि सिंचित है। जिसमें से 50 फीसदी से अधिक रकबा गौलापार, चोरगलिया इलाके में है। गौलापार का क्षेत्र टमाटर के लिए खासा प्रसिद्ध है। यहां का टमाटर दिल्ली, पाकिस्तान समेत तमाम राज्यों और विदेशों को सप्लाई होता है। स्वादिष्ट होने के साथ ही अच्छी नस्ल की टमाटर की पैदावार देने वाले इस क्षेत्र के किसानों को मंडी में टमाटर का वाजिब मूल्य भी नहीं मिलता है। सरकार और कृषि विभाग ने भी टमाटर उत्पादक किसानों को प्रोत्साहित करने और उनके उत्पादों को बाजार दिलाने के कोई प्रयास नहीं किए हैं। जिससे किसानों की आर्थिकी में प्रगति नहीं हो रही है।
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जब पाकिस्तान बार्डर खुला था तो गौलापार का टमाटर सीधे पाकिस्तान को सप्लाई हो रहा था। फिलहाल दिल्ली की मंडी में तो सीधे गौलापार का टमाटर जाता है। दिल्ली से अन्य राज्यों और विदेशों को यहां का टमाटर भेजा जाता है। क्षेत्र में करीब 700 हेक्टेयर भूमि में टमाटर का उत्पादन होता है। लेकिन मंडी में बिचौलिए और मुनाफाखोर किसानों की मेहनत पर डाका डालते हैं। किसानों को टमाटर का उचित मूल्य नहीं मिलता है। जिस कारण किसानों का खेती के प्रति मोहभंग हो रहा है।
- कमलेश चंद्र परगाई, बुजुर्ग किसान गंगापुर।
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न टमाटर का उचित मूल्य मिलता है और न ही समय पर कोई सलाह कृषि विभाग द्वारा दी जाती है। कई बार पाला गिरने से किसानों की टमाटर की फसल बर्बाद हो जाती है। उससे बचाव के लिए कृषि विभाग की ओर से किसी तरह की दवा आदि का प्रबंध नहीं किया जाता है। किसान खेती करता है लेकिन स्वयं पर निर्भर रहता है। क्षेत्र की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार और विभाग द्वारा कोई प्रबंध नहीं किया गया है।
- मंगल सिंह बर्गली, सेला भाबर।
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पानी नहीं मिलने से टमाटर की पर्याप्त सिंचाई नहीं हो पाती है। जिससे फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। मदनपुर के 16 परिवारों को तो पेयजल तक उपलब्ध नहीं हो रहा है। लोग गूलों का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। किसानों की उपेक्षा और मंडी में उचित मूल्य नहीं मिलने के कारण किसानों का खेती के प्रति रुझान कम हो रहा है। किसी दौर में तो टमाटर के लिए गौलापार अहम स्थान रखता था। आज भी उत्पादन तो होता है लेकिन सिंचाई और कृषि विभाग किसानों को कोई सहयोग नहीं करते हैं।
- कैलाश चंद्र भट्ट, बसंतपुर।
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खाद, बीज महंगा हो गया है। अब पेट्रोल, डीजल की कीमतें बढ़ने से खाद, बीज और महंगे हो जाएंगे। किसान जिस उम्मीद से टमाटर का उत्पादन कर रहा है. उस उम्मीद के मुताबिक उन्हें बाजार मूल्य नहीं मिल रहा है। अब जुताई भी महंगी हो गई है। खेती-किसानी में खर्चों में बढ़ोत्तरी हुई है। उस अनुपात में उन्हें बाजार मूल्य नहीं मिल रहा है। सरकार को किसानों की आय वृद्धि और टमाटर उत्पाद को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए।
- मनोहर, कुंवरपुर।
नहीं दिया गेहूं की फसल का मुआवजा
जिला पंचायत सदस्य प्रकाश गजरौला का कहना है कि 2012-13 में आपदा आने के बाद टमाटर की फसल नष्ट हुई। गेहूं की फसल भी बर्बाद हुई। टमाटर की क्षति का सरकार ने सर्वे भी कराया। लेकिन मुआवजा आज तक नहीं दिया गया। गेहूं की फसल का मुआवजा 1000 से 1500 रुपये तक क्षेत्र के मात्र 15 प्रतिशत किसानों को दिया गया। अन्य को अभी गेहूं का मुआवजा भी नहीं मिला है।
उत्तम नहीं अब निशीथ चाकरी तक सीमित है खेती
किसान कमलेश चंद्र परगाईं ने कृषि विशेषज्ञ ‘घाघ’ कवि की ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, निशीथ चाकरी, भीख निदान’ का उदाहरण देते हुए कहा कि कभी खेती को उत्तम दर्जा प्राप्त था। लेकिन आज उपेक्षा के कारण खेती तीसरे स्थान पर चली गई है। अब प्रथम स्थान नौकरी, दूसरा व्यापार और तीसरा स्थान किसानी ने ले लिया है।
15 ग्राम पंचायतें, 50 हजार की आबादी
खेड़ा, नवाड़खेड़ा. देवला तल्ला, देवला मल्ला, जगतपुर, कुंवरपुर, किशनपुर, सुरंदपुर रैक्वाल, लछमपुर, सीतापुर, बसंतपुर, मदनपुर, गंगापुर समेत क्षेत्र में 15 ग्राम पंचायतों में 50 हजार की आबादी निवास करती है। लेकिन प्रशासन ने क्षेत्रवासियों की हर तरह से उपेक्षा की है।