हल्द्वानी। वन विभाग प्रदेश में कीट भक्षी पौधों की प्रजातियों, उनके संरक्षण और इन पौधों में पाए जाने वाले औषधीय गुणों पर शोध करेगा। विभाग ने इसके लिए छह साल का प्लान तैयार किया है।
देश भर में कीट भक्षी पौधों की 40 प्रजातियां हैं। उत्तराखंड में कीट भक्षी पौधे (अल्पाइन बटरवर्ड) की तीन प्रजातियां हैं। ये पौधे 3500-4500 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। उत्तराखंड में यूट्रीक्यूलेरिया, पिंग्यूक्यूला और ड्रोसेरा अल्पाइन की प्रजाति रालम घाटी और ब्यास घाटी में मिलती हैं। उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड ने कीट भक्षी पौधों को लुप्त प्राय: प्रजातियों में रखा है।
यहां मिलते हैं कीट भक्षी पौधे
ड्रोसेरा : 3700 मीटर की ऊंचाई पर गोपेश्वर के मंडल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ के थल केदार और गैरसैंण के निकट भमोरटोली में पाया जाता है।
पिंग्यूक्यूला : 3500-4500 मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। यह मिलम, ऊपरी पिल्थी, बदरीनाथ, ऋषिगंगा घाटी, सुंदरढूंगा घाटी, नंदा देवी नेशनल पार्क, रामनी भुजगढ़ के पास पातालखंड में मिलता है।
यूट्रीक्यूलेरिया : 2400 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मिलता है। यह गढ़वाल हिमालय, रुद्रनाथ अल्पाइन में मिलता है।
कीट भक्षी पौधों की विशेषता
कीट भक्षी पौधों को प्रकृति ने सुंदर फूल दिए हैं, जिससे यह कीटों को आकर्षित कर लेते हैं। जब कीट इन पौधों के पास आते हैं तो यह चिपकने वाले पदार्थ छोड़ते हैं। इससे कीट इन पौधों पर चिपक जाते हैं। इन पौधों की ग्रंथियां कीटों को पचाने की क्षमता रखती हैं। इन पौधों में औषधीय गुण भी पाए जाते हैं।
कीट भक्षी पौधों पर शोध के लिए छह साल का प्लान तैयार किया गया है। शोध में पौधों की प्रदेश में प्रजातियों की संख्या, उनके वास स्थल और औषधीय गुणों की जानकारी हासिल की जाएगी। -संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक, अनुसंधान उत्तराखंड