करीब 100 साल पहले गौला पार में नदी से सटी जमीन में किसी भी किस्म के कब्रनुमा चबूतरे नहीं थे। बाद में यह इलाका घने जंगल में तब्दील हुआ जो बाद में आरक्षित वन क्षेत्र भी बना। यह जानकारी कुमाऊं की सबसे पुरानी वन डिवीजन के करीब 100 साल पुराने नक्शे से मिली है।
नक्शे के मुताबिक यहां नदी का बाढ़ क्षेत्र था। ऐसे में यह नक्शे अब ये कब्र स्वतंत्रता के संग्राम और महामारी में मारे जाने वालों की होने की धारणा पर सवाल खड़े कर रही है। वन्य अधिकारियों के अनुसार 1872 में कुमाऊं वन डिवीजन का गठन हुआ था।
यह डिवीजन सबसे पुरानी होने के साथ ही सबसे विशाल भी थी। इस डिवीजन में नैनीताल, ऊधम सिंह नगर, चंपावत का हिस्सा शामिल था। 1911 में इस डिवीजन को हल्द्वानी वन डिवीजन का नाम दिया। इसके बाद 1929 में डिवीजन का नक्शा बनाया गया था।
1970 के दशक में इस डिवीजन को विभाजित किया गया और तराई पूर्वी व तराई केंद्रीय वन डिवीजन का गठन किया गया। इधर 1929 के नक्शे के मुताबिक गौला पार नदी से किनारे की आईएसबीटी की आठ हेक्टेयर जमीन नदी का हिस्सा थी। यहां भी नदी बहा करती थी और बाद में यही नदी तट भी बना।
यह हिस्सा नदी के बाढ़ क्षेत्र भी था। इसके अलावा तराई पूर्वी वन डिवीजन की गौला रेंज के नक्शे से भी उक्त भूमि नदी का हिस्सा दिखाया गया है हालांकि इन नक्शे में इस भूमि को नदी की रेतीली भूमि भी दर्शाया गया है।
अगर वन डिवीजनों के इन नक्शों को सच माना जाए तो नदी के तट जो बाढ़ क्षेत्र में आता है वहां किसी भी किस्म का निर्माण किया जाना संभव नहीं है वो भी तब जब देश आजादी के लिए संघर्षरत था न की तकनीकी के लिए।
जो 1857 के संघर्ष या 1920 की महामारी में मारे गए लोगों की कब्रों की थ्योरी को प्रमाणित नहीं करता है। फिलहाल वर्तमान में इन चबूतरों के अस्तित्व से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। आईएसबीटी की जमीन पर सीमेंट व मिट्टी से बने चबूतरे कितने वर्ष पुराने हैं इसका खुलासा कार्बन डेटिंग के बाद ही हो पाएगा। फिलहाल प्रशासन ने वहां मिली हड्डियों के डीएनए की जांच करा रहा है।
किसी भी वन डिवीजन का नक्शे भौतिक सत्यता के आधार पर ही बनाए जाते हैं। अगर 1929 के नक्शे में नदी का हिस्सा है तो होगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।
- डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक पश्चिमी वन वृत्त