उत्तराखंड के खेतों की उर्वरा क्षमता कम हो रही है। इसके चलते फसल उत्पादन कम होने का खतरा बढ़ गया है। यह खुलासा अल्मोड़ा स्थित विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की मृदा स्वास्थ्य परीक्षण की जांच में हुआ है।
विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने मिट्टी की सेहत का हाल जांचने के लिए अल्मोड़ा, बागेश्वर और उत्तरकाशी जिले से 900 मिट्टी के सैंपल लिए थे। इसके बाद वैज्ञानिकों ने 10 पैरामीटर पर मिट्टी की जांच की थी। जांच रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड की जमीन तेजी से क्षारीय होे रही है। इसकी जांच में लगे वैज्ञानिक डा. विजय मीणा कहते हैं कि तीनों जिलों से 300-300 मिट्टी के सैंपल लिए गए थे। यह सैंपल जमीन से 0 से 15 सेमी तक गहराई से लिए गए थे।
40 प्रतिशत सैंपल में मिट्टी के क्षारीय होने का पता चला है। यह संकेत है कि मिट्टी अपनी उर्वरा क्षमता खो रही है। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा। डा. मीणा कहते हैं कि मिट्टी क्षारीय होने का एक कारण तेज बरसात होना है, इसके कारण जमीन की ऊपर की सबसे महत्वपूर्ण परत (न्यूट्रिशन सबसे ज्यादा होते हैं और यह परत हजारों साल में तैयार होती है) का क्षरण हो रहा है। इसके अलावा मिट्टी के क्षारीय होने का एक कारण चीड़ का पिरूल भी हो सकता है, हालांकि इसके बारे में अभी पूरी तरह नहीं कहा जा सकता है। संस्थान निदेशक ए. पटनायक कहते हैं कि पहले उत्तराखंड में मिट्टी के क्षारीय होने के उदाहरण नहीं मिलते थे। यह चिंताजनक बात है।
ऊंचाई वार डेटा किया गया एकत्र
हल्द्वानी। वैज्ञानिकों ने मिट्टी का सैंपल कहां से लिया है, उसका ऊंचाई (जीपीएस लोकेशन) के हिसाब से भी रिकार्ड तैयार किया है। डा. मीणा कहते हैं कि इससे यह समझने में मदद मिली है कि भूमि का व्यवहार ऊंचाईवार कैसा है। इसके अलावा जहां से सैंपल लिया गया है, उसकी निश्चित अंतराल के बाद जांच कर स्थिति जांचनी हो, तो भी कोई दिक्कत नहीं आएगी। आसानी से वैज्ञानिक बता सकते हैं कि पहले के बाद नई जांच में क्या अंतर आया है।
कुछ तरीकों से बचा सकते हैं उर्वरा क्षमता
हल्द्वानी। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर कुछ तरीकों को अपनाया जाए, तो घटती उर्वरा क्षमता को रोका जा सकता है। मसलन खेत की मेढ़ बंदी होनी चाहिए। इसके अलावा बुवाई ढाल के विपरीत करनी चाहिए।