नैनीताल। नैनीताल से करीब पांच किमी दूर सरिताताल में काई (कैरा शैवाल) का पोषण बारापत्थर से बहकर आ रही घोड़े की लीद कर रही है। पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र सरिताताल में इन दिनों कैरा शैवाल के सड़ने से क्षेत्रवासी परेशान है। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि घोड़े की लीद को सरिताताल में जाने से रोकना होगा, तभी समस्या का हल हो पाएगा।
बता दें कि सन 2006 में सरिताताल का पुनर्निर्माण किया गया था। ताकि पानी जमाकर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सके। साथ ही यह झील पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गई, जिसके चलते कई पर्यटन गतिविधियों से इस क्षेत्र में लोगों को रोजगार मिल गया। लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते बीते एक साल से झील पर किसी का ध्यान नहीं गया और झील में काफी मात्रा में कैरा शैवाल फैल गया। कैरा शैवाल के सड़ने से अब ग्रामीण दुर्गंध से परेशान है।
खुर्पाताल के पूर्व प्रधान मनमोहन सिंह कनवाल ने बताया कि झील की सफाई के लिए कुमाऊं आयुक्त, डीएम, एसडीएम, सिंचाई विभाग सभी से निवेदन किया गया लेकिन अभी तक सफाई नहीं हो पाई है। इस कारण काई लगातार सड़ रही है, जिससे बीमारियों के फैलने का खतरा पैदा हो गया है।
सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता एचसी सिंह
ट्रीटमेंट के लिए सरिताताल से पानी की निकासी कर दी गई है। जीबी पंत यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के आधार पर झील में फैली काई का पारिस्थितिक उपचार किया जाएगा।
सीआरएसटी इंटर कॉलेज के जीव विज्ञान प्रवक्ता कमलेश चंद्र पांडे का कहना है कि सरिताताल में जो काई है वह कैरा नामक शैवाल है। जो कठोर पानी में तेजी से विकास करता है। सरिताताल के पानी में कैल्शियम आयरन जैसे कई तत्व हैं जो उस शैवाल के लिए पोषण का काम कर रहे हैं। यह शैवाल सूखने के बाद भी नहीं मरता। इसके ट्रीटमेंट के लिए गंदगी व बारापत्थर से बहकर आने वाली घोड़े की लीद को झील में जाने से रोकना होगा।