बाजपुर में वन कर्मियों की टीम ने पकड़की खैर और सागौन के गिल्टे।
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तराई में जंगलों और वनसंपदा की रक्षा करने वाले पहरेदार (वनकर्मी) ही अब सुरक्षित नहीं रहे। कभी धारदार हथियारों से हमला तो कभी फायरिंग और वाहनों से कुचलने की कोशिश। पिछले पांच वर्षों में जिले में वन विभाग की टीमों पर 35 से अधिक हमले हुये। जो कुमाऊं में सबसे अधिक हैं।
बुधवार देर रात बाजपुर की पहाड़ी कॉलोनी में गोदाम पर छापेमारी के दौरान वन विभाग की टीम पर धारदार हथियारों से हमला हुआ। अलग-अलग घटनाओं में सामने आए हिंसक विरोध से वनकर्मियों के लिए कार्रवाई करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। वन विभाग की टीमों को कई बार सीमित कर्मचारियों और संसाधनों के साथ तस्करी रोकने के लिए दबिश देनी पड़ती है। जंगलों और दूरस्थ इलाकों में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना भी आसान नहीं है। कार्रवाई के दौरान तस्करों के संगठित विरोध की आशंका रहती है।
यूपी की सीमा का फायदा उठा रहे तस्कर
यूपी से लगी सीमा वन अपराधों की निगरानी को चुनौतीपूर्ण बनाती है। रामपुर और बरेली समेत सीमावर्ती जिलों से तस्कर आसानी से जिले में आकर घटनाओं को अंजाम देते हैं और जंगलों का फायदा उठाकर यूपी फरार हो जाते हैं। वर्ष 2025 में ही वन विभाग कुख्यात तस्कर को पकड़ चुका है। ऐसे में अपराधों पर रोक लगाने के लिए उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की पुलिस व वन विभाग के बीच संयुक्त निगरानी होनी जरूरी है।
जंगल से गोदाम तक फैला तस्करी का खेल
वन संपदा की चोरी केवल जंगलों में पेड़ काटने तक सीमित नहीं है। कीमती लकड़ियों को काटने, ढुलाई करने और गोदामों में जमा करने के बाद खपाने तक का पूरा सिलसिला जांच के दायरे में आता है। तस्करी पर प्रभावी रोक लगाने के लिए लकड़ी के भंडारण, परिवहन और खरीद-फरोख्त से जुड़े लोगों की जांच भी जरूरी है।
2024 और 2025 में वनकर्मियों पर हमले के दो जिलों के आंकड़े
जिला / प्रभाग वर्ष 2024 वर्ष 2025 संवेदनशील क्षेत्र
ऊधम सिंह नगर 12 05 बाजपुर, गदरपुर, टांडा, सितारगंज
नैनीताल 02 01 रामनगर, कॉर्बेट पार्क के आस-पास का क्षेत्र