हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के करीब बसी एक अवैध बस्ती, चारों ओर गंदगी और कीचड़ से सने लोग, बस्ती के बाहर सैकड़ाें की तादात में रखे कच्चे ढोलक। ढोलों पर कोई मसाला लगाता हुआ तो कोई पेंट करता हुआ। कोई खाल और रस्सी लगाता हुआ। हल्द्वानी की ढोलक बस्ती के बाहर इन दिनों होली के लिए रात-दिन ढोलक तैयार की जा रही है, जो कि सिलिगुड़ी (पश्चिम बंगाल) से लेकर नेपाल तक और उड़ीसा से लेकर हिमाचल तक बेचने के लिए ले जाई जाएगी।
ढोलक बस्ती निवासी शेर अली बताते हैं कि साल भर रोजी रोटी को तरसने वाले ढोलक के कारीगर होली आने से पहले काफी व्यस्त हो जाते हैं, क्योंकि होली और आसपास पड़ने वाले त्योहारों पर ढोलकों की देश भर में डिमांड होती है, खासकर उत्तराखंड में सबसे ज्यादा डिमांड होती है, जबकि ढोलक बनाने वाले अब काफी कम लोग बचे हैं। शेर अली बताते हैं कि अमरोहा से ढोल का खांचा मंगवाया जाता है।
इसके बाद यहां उस पर मसाला, पेंट, खाल और रस्सी लगाकर ढोलक तैयार की जाती है। सीजन में करीब 5000 ढोलक लेकर यहां से कारीगर देश भर में जाते हैं, जिनमें से ज्यादातर ढोलकें बिक जाती हैं। मुख्य रूप से पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर, चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी, नेपाल, यूपी, सिलिगुड़ी, सिक्किम, उड़ीसा, हैदराबाद में ढोल बेची जाती है। इसके अलावा लोकल में भी होली के लिए इनकी डिमांड है।
यूं ही नहीं पड़ा ढोलक बस्ती नाम
ढोलक बनाने वाले कुछ कलाकार कई दशक पहले यहां आकर बसे थे। धीरे-धीरे इनका कुनबा बढ़ता गया और इस जगह का नाम ढोलक बस्ती हो गया। धीरे-धीरे इनकी ढोलक और ये बस्ती इतनी फेमस हो गई कि आज खूबसूरत हल्द्वानी स्टेशन की पहचान इसी बस्ती से है।