फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अध्यात्म, रोमांच, खूबसूरती की त्रिवेणी है ‘टीटेश्वरी मां’

Sat, 08 Oct 2016 01:30 AM IST
निशांत खनी
विज्ञापन
दुर्गा पूजा
विज्ञापन
देवी के नौ रूप। कुछ कोमल और कुछ बेहद कठोर। देवी के इन नौ रूपों को एक साथ देखने की एक यात्रा घने जंगल में तेंदुए, जंगली सुअर, भालू और अन्य जंगली जानवरों के बीच से गुजारती है। आस्था और रोमांच का अद्भुत संगम कराती। अनुभव के इस बियावान में बुग्याल की खूबसूरती से रूबरू होना है मां टीटेश्वरी तक पहुंचना।
विज्ञापन



हल्द्वानी से करीब 60 किलोमीटर दूर और कोटाबाग तल्या से छह किलोमीटर की सीधी खड़ी चढ़ाई में प्रकृति परत दर परत अपने रहस्य खोलती है। सौंदर्य की अनुभूति अध्यात्म की उन शंातिदायी सीढ़ियों तक भी पहुंचाती है जिसके लिए पहाड़ जाना जाता है। टीटेश्वरी मां का पौराणिक मंदिर है। धार्मिक ग्रंथों में इसका जिक्र है।

पत्थर की चट्टान की नौ परतों में मां की अलग-अलग रूपों में आकृतियां हैं। इसी चट्टान में हनुमान और शेर के मुंह भी उभरे हैं। टीटेश्वरी मां सिद्धि दात्री हैं। श्रद्धालु माता के दर्शनों के साथ खुद को प्रकृति के अनुरूप ढाल लेते हैं। बांज के घने जंगल होने से मौसम भी पल-पल बदलता है।
विज्ञापन


मंदिर के ठीक ऊपर खूबसूरत बुग्याल है। बुग्याल से आसपास के गांवों के अलावा कालाढूंगी, कोटाबाग, रामनगर, गूलरभोज और बाजपुर का खूबसूरत नजारा दिखता है।


2000 में हुई मूर्ति स्थापना

मंदिर में वर्ष 2000 में मूर्ति स्थापना हुई। इससे पहले पत्थर पूजा होती थी। नागा बाबा खेम गिरी महाराज के कार्यकाल में धर्मशाला, शौचालय, सीढ़ियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए हाल का निर्माण भी हुआ।

कैसे पहुंचे मंदिर

मंदिर जाने के लिए तल्या तक मोटर मार्ग है। श्रद्धालु बकरखेत में पहला पड़ाव डालते हैं। बकरखेत से तीन किमी बाद टीटेश्वरी मंदिर की धर्मशाला है। मंदिर के पुजारी एवं व्यवस्थापक धारा बल्लभ कत्यूरा बताते हैं, अधिकांश श्रद्धालु जुलाई में बरसात शुरू होने से पहले मंदिर आते हैं। बरसात होने पर जौंक लगने लगती हैं।

नवंबर और दिसंबर में हिमपात होने से रास्ते बंद होते हैं। मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष घनश्याम सिंह अधिकारी के मुताबिक जून पहले पखवाड़े में हर साल भागवत के साथ भंडारा होता है।

मंदिर से जुड़ी किंवदंती
बताते हैं, हजारों साल पहले सुनौला (कोटाबाग) के एक ब्राह्मण के सपने में मां आई। मां ने ब्राह्मण को पूजा अर्चना के लिए बुलवाया। ब्राह्मण भोर में ही जंगल की ओर चला पड़ा। तल्या से छह किमी टीट जंगल पहुंचने पर ब्राह्मण थक गया और एक चट्टान के नीचे बैठ गया।

अचानक उसकी नजर चट्टान के ऊपर पत्थरों पर पड़ी तो वह चौंका। चट्टान में शेर की प्रतिमा और मां की अलग-अलग रूपों में आकृतियां उभरी हुई थीं। तभी से वहां माता की पूजा अर्चना शुरू होने लगी और माता का मंदिर टीटेश्वरी नाम से विख्यात हो गया।

मंदिर के ठीक ऊपर बुग्याल है, जिसे टीट खेत भी कहते हैं। चरवाहे बुग्याल में मवेशियों के साथ रहते हैं। बताते हैं सदियों पहले पतलिया के एक चरवाहे ने टीट बुग्याल में खेती करने के लिए बैल जोत दिए। बुग्याल में हल चलाते ही चरवाहा अपने बैलों के साथ जमीन के अंदर समा गया।

काफी दिनों तक चरवाहे की खोजबीन हुई। चरवाहा और बैल नहीं मिले। गांव वाले यही समझे कि चरवाहा और बैलों को जंगली जानवर खा गया। गांव वाले चरवाहे की भैंसों को घर ले आए और चरवाहे का कर्मकांड तक कर दिया।

ठीक छह महीने बाद वही चरवाहा अपने घर के पास मंदिर से करीब 15 किमी दूर खेत में बैल जोतते प्रकट हो गया। चरवाहे ने पूरी कहानी ग्रामीणों को बताई। इसी के बाद पतलिया में भी मां टीटेश्वरी मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की गई।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें