देवी के नौ रूप। नौ रूप भी ऐसे जिन्हें प्रकृति ने बेहद कठोर चट्टान पर अपने हाथों से गढ़ा हो। देवी के इन नौ रूपों को एक साथ देखने के लिए यात्रा भी किसी तीर्थ के फल पाने से लेकर घने जंगल में तेंदुए, जंगली सुअर, भालू और अन्य जंगली जानवरों के बीच से गुजरना हो तो अध्यात्म और रोमांच का संगम होगा ही। अनुभव के इस बियावान में बुग्याल की खूबसूरती से रूबरू होना है मां टीटेश्वरी तक पहुंचना। हल्द्वानी से करीब 60 किलोमीटर दूर और कोटाबाग तल्या से छह किलोमीटर की सीधी खड़ी चढ़ाई में प्रकृति परत दर परत अपने रहस्य उकेरती है और सौंदर्य की अनुभूति अध्यात्म की उन सीढ़ियों तक भी पहुंचाती है जिसके लिए पहाड़ जाना जाता है।
टीटेश्वरी माता का पौराणिक मंदिर है। कुमाऊं के इतिहास में मंदिर का जिक्र है। एक पत्थर के चट्टान में नौ परतों में मां की अलग-अलग रूपों में आकृतियां हैं। इसी चट्टान में हनुमान और शेर के मुंह भी उभरे हैं। टीटेश्वरी माता शक्ति पीठ सिद्धि दात्री हैं और सभी नौ रूप हैं। श्रद्धालु माता के दर्शनों के साथ खुद को प्रकृति के अनुरूप ढाल लेते हैं। मंदिर के आसपास बांज के घना जंगल होने से मौसम भी पल-पल बदलता रहता है। मंदिर के ठीक ऊपर खूबसूरत बुग्याल है। बुग्याल से नैनीताल जिले के आसपास के सभी गांवों के अलावा कालाढूंगी, कोटाबाग, रामनगर, गूलरभोज और बाजपुर का खूबसूरत नजारा दिखता है।
मंदिर से जुड़ी किंवदंती
>> हजारों साल पहले सुनौला (फतेहपुर) के एक ब्राह्मण के सपने में माता आई। मां ने ब्राह्मण को पूजा अर्चना के लिए टीट बुलाया। ब्राह्मण भोर में ही उठकर जंगल चला गया। तल्या से सात किमी पैदल जंगल में चलने पर ब्राह्मण थक गया और एक चट्टान के नीचे बैठ गया। अचानक उसकी नजर चट्टान के ऊपर पत्थरों पर पड़ी तो वह चौंका। चट्टान में शेर की प्रतिमा और मां की अलग-अलग रूपों में आकृतियां उभरी हुई थीं। तभी से वहां माता की पूजा अर्चना शुरू होने लगी और माता का मंदिर टीटेश्वरी नाम से विख्यात हो गया।
कोटाबाग ब्लाक का सुनौला ब्राह्मणों का गांव है। यहां सनवाल रहते हैं। सुनौला के ब्राह्मण ने ही टीट में माता के अवतार होने की जानकारी गांव में दी। गांव के सभी ब्राह्मण बारी बारी से माता की पूजा अर्चना करने लगे। पूजा करने वाले ब्राह्मण से खुश होकर माता एक सोने का सिक्का भेंट करती थी। सिक्का चट्टान की एक गुफा से गिरता था। कहते हैं एक ब्राह्मण के मन में लालच आ गया। जिस गुफा से सिक्का गिरता था ब्राह्मण ने वहां लकड़ी डाल दी, ताकि सारे सिक्के उसे मिल जाएं। ब्राह्मण के इस लालच के बाद गुफा से सिक्के गिरने बंद हो गए।
मंदिर बांज के घने जंगलों के बीच है। मंदिर से करीब 50 मीटर दूरी में एक स्रोत है। स्रोत के पानी से ही माता का भोग और प्रसाद तैयार होता है। पानी के आसपास गंदगी करने से स्रोत सूख जाता है। बताते हैं दशकों पहले चार श्रद्धालु मंदिर आए। एक श्रद्धालु को प्यास लगी और वह पानी पीने स्रोत चला गया। श्रद्धालु ने स्रोत में मुंह लगाकर पानी पी लिया। श्रद्धालु जिस स्थिति में पानी पीने झुका था वहीं उसी स्थिति में अचेत हो गया। काफी देर तक जब वह मंदिर नहीं पहुंचा तो उसके साथियों ने खोजबीन की। स्रोत में वह अचेत मिला। माता की पूजा अर्चना के बाद ठीक हुआ।
मंदिर के चट्टान के ठीक ऊपर बुग्याल है। जिसे टीट खेत भी कहते हैं। चरवाहे बुग्याल में महीनों तक मवेशियों के साथ रहते हैं। बताते हैं करीब दो सौ साल पहले पतलिया के एक चरवाहे ने टीट बुग्याल में खेती करने के लिए बैल जोत लिए। बुग्याल में हल चलाते ही चरवाहा बैलों के साथ जमीन के अंदर समा गया। काफी दिनों तक चरवाहे की खोजबीन हुई। चरवाहा और बैल नहीं मिले। गांव वाले यही समझे कि चरवाहा और बैलों को जंगली जानवर खा गया। गांव वाले चरवाहे के भैंसों को घर ले आए और चरवाहे का कर्मकांड तक कर दिया। ठीक छह महीने बाद वही चरवाहा अपने घर के पास खेत में बैल जोतते प्रकट हो गया। चरवाहे ने पूरी कहानी ग्रामीणों को बताई। इसी के बाद पतलिया में भी मां टीटेश्वरी मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की गई।
2000 में हुई मूर्ति स्थापना
मंदिर में वर्ष 2000 में मूर्ति स्थापना हुई। इससे पूर्व पत्थर पूजा होती थी। नागा बाबा खेम गिरी महाराज मंदिर में आए और उन्हीं के कार्यकाल में धर्मशाला, शौचालय, सीढ़ियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए हाल का निर्माण हुआ।
कैसे पहुंचे मंदिर
मंदिर जाने के लिए कोटाबाग तल्या तक मोटर मार्ग है। तल्या से करीब छह किमी पैदल चढ़ाई है। श्रद्धालु बकरखेत में पहला पड़ाव डालते हैं। बकरखेत में पेयजल के लिए नल है। यहां से तीन किमी चलने के बाद सीधे टीटेश्वरी मंदिर का धर्मशाला पहुंच जाते हैं। मंदिर के पुजारी एवं व्यवस्थापक धारा बल्लभ कत्यूरा बताते हैं, आमतौर पर अधिकांश श्रद्धालु जनवरी से जुलाई पहले सप्ताह तक मंदिर पहुंचते हैं। जुलाई में बरसात होने पर जौंक लगने लगती हैं। जबकि नवंबर और दिसंबर में हिमपात होने से रास्ते बंद होते हैं। मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष घनश्याम सिंह अधिकारी के मुताबिक जून पहले पखवाड़े में हर साल भागवत के साथ भंडारा होता है।