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विश्व सामाजिक न्याय दिवस पर हल्द्वानी से मांगी गई खबर

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नैनीताल। जब तक प्रत्येक व्यक्ति जागरूक नहीं होगा तब तक विश्व सामाजिक न्याय दिवस की परिकल्पना को साकार नहीं किया जा सकता है। इसके लिए सरकार के साथ ही सामाजिक संगठनों को भी आगे आकर पहल करनी होगी।
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यह कहना है कि कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर के समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष और डीएसबी परिसर के अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. डीएस बिष्ट का। विश्व सामाजिक न्याय दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला से हुई बातचीत में प्रो. बिष्ट ने कहा कि वर्ष 2009 से 20 फरवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस की शुरुआत हुई और तब से लेकर अभी तक हर साल विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाया जाता है।
प्रो. बिष्ट का कहना है कि विश्व सामाजिक न्याय दिवस का उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों, भेदभाव और असमानता को खत्म करना है। वह कहते हैं कि एक ओर तो वैज्ञानिक वर्तमान में मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने की योजना पर काम कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर अभी भी लोगों में असमानता और भेदभाव देखा जा सकता है। प्रो. बिष्ट कहते हैं सामाजिक कुरीतियों में लिंग भेद, दहेज प्रथा, महिला हिंसा, नशाखोरी, भ्रूण हत्या आज भी देखने को मिलती है, यह स्थिति तब है जबकि आज शिक्षा पर सरकार सालाना करोड़ों रुपये खर्च कर रही है।
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प्रो. बिष्ट कहते हैं कि सामाजिक कुरीतियों, भेदभाव और असमानता को तब तक दूर नहीं किया जा सकता है जब तक कि प्रत्येक व्यक्ति जागरूक न हो। जागरूकता के लिए प्राथमिक स्तर पर ही शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए जाएं जो बच्चों को इन सब के खिलाफ जागरूक करें।
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