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राखी की डोर बांधने से पहले बहन की जान चली गई    

Mon, 07 Aug 2017 02:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो हल्द्वानी। 
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युवती का फाइल फोटो - फोटो : amar ujala
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दिल्ली से भाई को राखी बांधने आ रही युवती की रामपुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरते समय पैर फिसल गया। ट्रेन की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई। स्टेशन पर मौजूद लोग चर्चा कर रहे थे कि भाई की कलाई में राखी की डोर बांधने से पहले बहन की डोर जीवन से टूट गई। 
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 पेशकारपुर हल्दूचौड़ निवासी हरीश चंदोला की पुत्री निर्मला उर्फ नीरू (27) रक्षाबंधन के पर्व पर अपनी बड़ी बहन की बेटी के साथ दिल्ली से ट्रेन द्वारा घर आ रही थी। रामपुर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरते समय नीरू का पैर फिसल गया। ट्रेन की चपेट में आने से युवती गंभीर रूप से घायल हो गई।

स्टेशन पर मौजूद लोग उसे रामपुर स्थितसरकारी अस्पताल लेकर गए। यहां चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद घायल निर्मला को दिल्ली एम्स के लिए स्थानांतरित कर दिया, लेकिन शरीर से अत्यधिक रक्तस्राव के चलते मुरादाबाद के पास निर्मला ने दम तोड़ दिया।
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निर्मला के पिता हरीश चंदोला आर्मी से सेवानिवृत्त हैं। निर्मला पांच बहनों और एक भाई में चौथे नंबर की थी। नीरू की मौत की खबर सुनते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ पड़ी। शव आने पर उसका रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर अंतिम संस्कार किया गया।  

नीरू दीदी को वापस लाओ, राखी बधवानी है

बहन की मौत से भाई मनीष का रो-रोकर बुरा हाल हो गया है। भाई रोते हुए कह रहा था कि मेरी नीरू दीदी को वापस ला दो। बहन मुझे राखी जरूर बांधेगी।  बदहवास भाई के गम को देखकर पड़ोसियों की भी आंखें डबडबा गई। 

पांच बहनों  में चौथे नंबर की निर्मला परिवार की लाडली थी। बेहद हंसमुख निर्मला अपनी सहेलियों की भी बेहद चहेती थी। कोई उसे नीरू कहता तो कोई नीरू दीदी कहकर पुकारता था। बेटी की मौत से माता, पिता का रोते-रोते बुरा हाल हो गया है।

भाई मनीष की आंखें एक दिन पहले से बहन के हाथों राखी बंधवाने की आस लगाया था, लेकिन एक मनहूस खबर ने भाई के सपनों को तार तार कर दिया। मनीष अपनी बहनों में सबसे ज्यादा नीरू का ही लाडला था, दोनों भाई बहन अक्सर साथ बाजार जाते, अक्सर आपस में झगड़ा भी करते थे।

मनीष को जब भी कोई जरूरत पड़ती तो वह नीरू से ही सिफारिश करवाता और नीरू भी अपने भाई के पक्ष में खड़ी हो जाती थी। पड़ोस में भी कोई भी कार्यक्रम हो नीरू उसमें जरूर हिस्सा लेती थी। युवती का व्यवहार उसे ज्यादा लोगों का अपना बना दिया था।

जब कभी उसे समय मिलता तो वह छोटे बच्चों को निशुल्क कोचिंग कराने लगती थी। पड़ोस के बच्चे भी उसे अपने परिवार का सदस्य मानते थे। नीरू अक्सर उन्हें समझाती भी रहती थी। किसी को यकीन ही नहीं हो रहा कि अपनों से भी ज्यादा अपनापन रखने वाली नीरू इतना दूर चली गई कि अब कभी सामने नहीं आएगी। 

 आरपीएफ और चिकित्सकों पर उठे सवाल 

निर्मला की मौत के बाद परिजन आरपीएफ की लापरवाही और डॉक्टरों की संवेदनहीनता पर सवाल उठा रहे हैं। परिजनों का कहना है कि काश आरपीएफ ने मानवीयता दिखाई होती तो निर्मला की जान बच सकती थी। आरोप है कि आरपीएफ ने निर्मला को अस्पताल पहुंचाने में काफी देर की।

जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही नीरू ने किसी की मदद से अपनी बड़ी बहन को फोन कर असहनीय दर्द को बयां किया। डॉक्टरों ने भी इलाज में टालमटोल की और कुछ देर बाद उसे दिल्ली के लिए रेफर कर दिया। अधिक रक्तस्राव के चलते युवती की असमय मौत हो गई।
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