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भवाली सैनिटोरियम में 70 फीसदी मरीज यूपी के

Wed, 25 Mar 2015 01:41 AM IST
कमलेश जोशी/अमर उजाला, भवाली
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जर्जर हालत में पहुंच चुके भवाली सैनिटोरियम में अभी भी करीब 70 फीसदी मरीज उत्तर प्रदेश के हैं। अस्पताल में उत्तराखंड के मरीजों की संख्या 30 फीसदी से भी कम है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो डाट्स योजना शुरू होने के बाद इलाज अधूरा छोड़ने वाले मरीजों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है।
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1912 में अंग्रेजों ने क्षयरोग अस्पताल की स्थापना की, जो बाद में भवाली सैनिटोरियम के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 207 कर्मियों वाले इस अस्पताल में हर माह 70 लाख रुपए से अधिक वेतन पर ही खर्च होते हैं। दवा की व्यवस्था भले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से निशुल्क होती है, लेकिन मरीजों के भोजन, रखरखाव और कर्मियों की वर्दी में हर साल 25 लाख रुपए खर्च होते हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो यूपी के मेरठ, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं, पीलीभीत, बिलासपुर के मरीजों की संख्या अधिक है। जबकि उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिले के मरीज भी यहां इलाज को पहुंचते हैं।

जबकि राज्य के पहाड़ी जिलों से इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या दस फीसदी से भी कम है। सैनिटोरियम के प्रभारी मुख्य चिकित्साधीक्षक डा. टीसी पंत के मुताबिक अस्पताल में हर साल पांच हजार से अधिक ओपीडी होती हैं इसमें 600 के करीब मरीज हर साल अस्पताल में भर्ती किए जाते हैं। अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में अधिकांश वह हैं जो डाट्स के तहत आधा अधूरा इलाज करा चुके हैं। ऐसे मरीजों की संख्या डाट्स योजना शुरू होने के बाद बढ़ी है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक इस योजना में मरीजों को भर्ती नहीं किया जाता है, बल्कि उन्हें घर पर ही दवा उपलब्ध कराई जाती है।
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गेठिया सैनिटोरियम की हालत भी खराब
हल्द्वानी-भवाली रोड में स्थित गेठिया सैनिटोरियम की हालत भी भवाली स्थित सैनिटोरियम से अलग नहीं हैं। 1953 में स्थापित इस अस्पताल में 60 फीसदी यूपी के मरीज इलाज को पहुंचते हैं। 66 बेड वाले इस अस्पताल के 64 कर्मचारियों और मरीजों पर सालाना ढाई करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं।

अधूरी रही कायाकल्प की घोषणाएं
भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारों ने सैनिटोरियम के कायाकल्प की कई घोषणाएं की। किसी ने चेस्ट इंस्टीट्यूट तो किसी ने आयुष ग्राम बनाने के दावे किए। सैनिटोरियम में करोड़ों की मशीन जंक खा चुकी हैं।
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