पर्वतीय क्षेत्रों में बांज, बुरांश और अयार के जंगलों में पाए जाने वाले रोनू की देश में काफी डिमांड बढ़ गई है। फर्न रोनू (पहाड़ में प्रचलित नाम रौन) गुलदस्तों, गार्डन प्लांट और बुके के बीच अपनी मौजूदगी से लोगों का दिल जीत रहा है। पहाड़ के घने जंगलों से गाजियाबाद फूलों की मंडी तक का सफर तय कर रहा रोनू वहां से देश भर की मंडियों में पहुंच रहा है।
फर्न प्रजाति के रोनू का वानस्पतिक नाम ड्रायोप्टेरिस है। यह बांज, बुरांश और अयार के जंगलों में करीब 1500 से 2100 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। रोनू मुख्य रूप से उन स्थानों पर पाया जाता है जहां पत्तियों के ढेर से खाद तैयार होती है और यह रोनू के पनपने के लिए खास वातावरण तैयार करती है।
पहाड़ के कई लोगों ने रोनू में ही अपना रोजगार चुन लिया है। यहां के लोग रोनू को गाजियाबाद फूल मंडी तक पहुंचा रहे हैं, जहां एक बोरी रोनू की कीमत दो से ढाई हजार रुपए तक आसानी से मिल जा रही है। गाजियाबाद से यह देश की अन्य फूल मंडियों तक भेजा जाता है। कुमाऊं की पहाड़ियों में बहुतायत पाया जाना वाला ड्रायोप्टेरिस बारह महीनों में मिलता है। इसकी पत्तियों की खास बनावट इसे बेहद खूबसूरत बनाती है। हल्द्वानी में फ्लावर डेकोरेशन का काम करने वाले सुरेंद्र सिंह बताते हैं कि अन्य फूलों के साथ रोनू की पत्तियां अपनी विशेष बनावट के चलते खासी पसंद की जाती है।