हल्द्वानी। अगर आपको श्रीलंका का नागकेशर, दक्षिण अफ्रीका का लक्ष्मी तरु, चीन का पुत्रजीवा, पाकिस्तान का चमरोड़, आस्ट्रेलिया का रोबस्टा या जापान का कपूर का पेड़ देखना है तो वन अनुसंधान केंद्र हल्द्वानी में देख सकते हैं। वन अनुसंधान केंद्र हल्द्वानी ने कुमाऊं का सबसे बड़ा अर्बोरेटम (वनस्पति उद्यान) विकसित किया है। यहां उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में उगने वाले हिसालू, घिंगारु, किल्मोड़ा, कश्मीर का कासमीरव, बिहार की गुड़भेली, असोम की चाय के पौधों समेत 125 प्रजातियां संरक्षित की गई हैं। इनमें से कई अति दुर्लभ प्रजातियों की श्रेणी में है।
अनुसंधान केंद्र ने पांच साल की मेहनत के बाद कुमाऊं का सबसे बड़ा उद्यान केंद्र विकसित किया है। अनुसंधान केंद्र ने इनके वैज्ञानिक अभिलेख भी तैयार किए हैं जिसमें अधिकांश प्रजातियां दुर्लभ श्रेणी की हैं।
इन पर चल रहा है प्रमुख शोध
करोंदा, बेल, वट, अशोक, सालसा, चंपा, हल्दू, ढाक, हरड़, रुद्राक्ष, अखरोट, जामुन, कचनार, कंदब, कपूर, सिकाकाई, चिरंजी, तेजपात, सहजन, तिमूर, महुवा, कृष्ण वट, कुंभी, श्योनक, रोहिणी, पारीजात, सिंदूरी, रुद्राक्ष, बालमखीरा, खटाई, मालकांघनी, दहिया, कालाशीशम, चितवन, धामन, डम्मर।
हल्द्वानी वन अनुसंधान केंद्र में करीब पांच वर्षों की मेहनत से कुमाऊं का सबसे बड़ा अर्बोरेटम विकसित किया गया है। अर्बोरेटम विकसित करने का उद्देश्य वनस्पतियों को संरक्षित कर उन पर शोध करना है।
-संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक, अनुसंधान